राजा गुणसेन लतामंडप में सिंहासन पर जाकर बैठे। महामंत्री के साथ गपशप कर रहे हैं…… इतने में वहां यकायक दो सौम्य आकृतिवाले तापसकुमार आ पहुंचे।
‘महाराजा, ते कुशलमस्तु !’ तापसकुमारों ने राजा को आशीर्वाद दिये। उनके हाथ मे नारंगी और कोष्ठ के फल थे। वे फल उन्होनें राजा को भेंट किये। राजा सिंहासन पर खड़ा हुआ। तापसकुमारों को दो हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर, प्रणाम किये। बैठने के लिये प्रार्थना की। पर तापसकुमार खड़े रहे । उन्होंने मधुर स्वर में कहा :
‘महाराजा , हमारे पुण्यनामधेय कुलपति ने आपके शरीर की कुशलपुच्छा के लिए हमें आपके पास भेजा है । क्योंकि आप ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम-इन चारों आश्रमों के पालक हैं , एवं संरक्षक हैं । धर्म – अधर्म की व्यवस्था करनेवाले हैं ।’
राजा मासूम , गेरुए वस्त्रधारी और सौम्य आकुतिवाले दोनों तापसकुमारों को देखता ही रहा । उनकी विन्ययुक्त मधुर वाणी सुनकर आनंदित हो उठा। उसने पूछा :
‘पूज्य, आपके कुलपति भगवंत कहां पर बिराजते हैं ?’
‘सुपरितोष’ तपोवन में ।’
‘वह तपोवन यहां से कितनी दूरी पर है ?’
‘ज्यादा दूर भी नहीं …. एकदम नजदीक भी नहीं है।’
राजा को तापसकुमार अच्छे लगने लगे थे । ‘सुपरितोष’ नाम भी मन को भा गया था । उन्होंने महामंत्री के सामने देखा और कहा : ‘हम तपोवन में जाएं। कुलपति के दर्शन करें । अनेक तपस्वी साधकों के दर्शन करें; और तपोवन की व्यवस्था भी देख लें ।’
‘सही बात है महाराजा , कुलपति ने तापसकुमारों को भेजकर आपकी कुशलता पुछवाई है ; तो हमें भी उन साधुपुरुषों की कुशलपुच्छा करने के लिए जाना चाहिए ।’
‘तो फिर अपने दो घोड़े रखकर , अन्य घोड़ों को साईस के साथ राजमहल लौटा दें ।’
राजा और मंत्री दो तापसकुमारों के साथ तपोवन की ओर चले । एस साईस दो घोड़ों को लेकर पीछे आने लगा ।
तपोवन के समीप आते ही एक तापसकुमार ने उंगली से इशारा करते हुए राजा से कहा :
‘वह हमारा ‘सुपरितोष’ तपोवन है ।’
‘कितना रमणीय और अहलादक इलाका है ।’ राजा के मुंह से तपोवन की प्रशंसा के उदगार सहसा निकल गये ।
तपोवन में प्रवेश कर के तापसकुमार राजा को सीधे ही कुलपति की पर्णकुटिर , की ओर ले चले । राजा ने तपोवन में अनेक तापसों के दर्शन किये । तपोवन के नैसर्गिक सौन्दर्य को देखा । तापसकुमार ने राजा से कहा :
‘महाराजा , यह पर्णकुटिर हमारे कुलपति आर्य कौडिन्य की है ।’ पर्णकुटी के द्वार पर ही कुलपति प्रसन्न मुखमुद्रा में खड़े थे । उन्होंने राजा गुणसेन का अभिवादन करते हुए स्वागत किया । राजा कुलपति के दर्शन करके हर्षविभोर हो उठा । राजा को बैठने के लिए तापसकुमार ने दर्भासन दिया । मंत्री को भी आसन दिया ।
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