‘दो-दो महीने के उपवास हो गये… तीसरे महीने के उपवास की उसने कुलपति के पास प्रतिज्ञा भी ले ली… फिर भी कितनी समता है उन महातपस्वी को । शरीर के प्रति कितनी विरवित है उनकी ।’
‘आज … सच्ची तपस्विता के दर्शन हुए ।’
‘महाराजा के प्रति कितनी सहानुभूति व्यक्त्त की उस महानुभाव ने ? महाराजा की सदभावना का कितना ऊँचा मूल्यांकन किया । काफी बड़ी बात है यह । अपराध करनेवाले के मनोगत आशय में शंका नहीं करना , यह कोई कम महत्व की बात नहीं है ।’
‘सच बात है , अपराध की प्रवुत्ति करनेवाले मनुष्य में अपराध का भाव होता ही है…वैसा एकांतिक नियम नहीं है । मन में शुभ आशय होने पर भी आशय से विपरीत प्रवुत्ति कभी कभार हो जाती है…।’
‘अग्निशर्मा का एक उदात्त व्यक्त्तित्व आज देखने को मिला ।’
‘परंतु, महाराजा क्यों नहीं आये तपोवन में ?’
‘अग्निशर्मा ने बताया तो था…कि महाराजा खुद के लिए हुए अपराध पर इतनी शरम महसूस कर रहे हैं कि वे अपना मुँह कुलपति को दिखने में झिझक रहे हैं।’
तपोवन में , तापस लोग परस्पर इस तरह के वार्तालाप कर रहे थे । अग्निशर्मा तीसरे महीने के उपवास की प्रतिज्ञा लेकर अपनी पर्णकुटी में जाकर बैठ गया था ।
वह दिन पूरा हो गया था ।
दूसरे दिन महारानी वसंतसेना ने तपोवन के तापसों की भक्त्ति के लिए उत्तम द्रव्य तैयार करवाये। उघान में से श्रेष्ठ फल मंगवाये।
केसर – इलायची मिश्रित दूध के स्वर्ण कलश भरवाये। और यह सारी सामग्री तपोवन में पहुँचाने की सुचना परिचारकों को दी । राजा – रानी नित्यक्रम से निवुत होकर रथ में बैठकर तपोवन में आये ।
तपोवन के बाहरी इलाके में रथ में से उतर कर राजा – रानी ने तपोवन में प्रवेश किया । रस्ते में मिलने वाले सभी तापसों को प्रणाम करते हुए वे कुलपति के निवास स्थान पर पहुँचे । तापसकुमारों ने जाकर कुलपति को, राजा – रानी के आगमन के समाचार दिये।
कुलपति पर्णकुटी के बाहर आये ।
शरम का भारी बोझ महसूस करते हुए राजा – रानी ने कुलपति के चरणों में प्रणाम किया । कुलपति ने स्नेहपूर्ण शब्दों में कहा :
‘वत्स , तुम्हारा स्वागत है । कुशलता है ना ?’
‘भगवन , आपकी कृपा से और महातपस्वी के क्षमादान से हम दोनों कुशल हैं ।’ राजा गुणसेन ने कहा।
‘क्या करें ? यह संसार ही ऐसा है । अचानक अनचाही आफत चली आती है ।’
‘प्रभो, मेरी एक प्रार्थना का स्वीकार करेंगे ।’
‘कहो, निशिंचत होकर कहो ।’
‘भगवन, मुझे सभी तापसों की उत्तम खाघ पदार्थो से भक्त्ति करनी है , और थोड़ी देर महात्मा अग्निशर्मा की सेवा करनी है ।’
‘आनंद से दोनों कार्य कर सकते हो… मेरी इजाजत है।’