‘नाथ, जो होना निशिचत होता है ….. वही होता है …। उसे भला , कौन टाल सकता है ? आप शोकाकुल मत बनिए । हम अब एक महीने तक प्रतिदिन तपोवन में जाएंगे और उन महातपस्वी सहित सभी तापसों की सेवा – भक्त्ति करेंगे । इससे उनकी आत्मा को प्रसन्नता का अनुभव होगा …. और हमें भी संतोष मिलेगा । गलती के अहसास का भार कुछ हल्का होगा ।’
‘तुम्हारी बात उचित है देवी , संतो की सेवा से संताप दूर होता है…। हम रोजाना जाएंगे तपोवन में, परंतु देवी , अब तुम्हें ज्यादा परिश्रम लेना , ठीक नहीं है । तुम्हारे दिन निकट आ रहे हैं । कुल महत्तर मुझे बता रही थी : ‘अब महारानी को महल के बाहर नहीं निकलना चाहिए ।’
‘अभी चार-पाँच दिन तो मैं आपके साथ आऊंगी …. बाद में आप मंत्रीवर्ग के साथ जाना ।’
राजा ने शरीर पर से शस्त्रों को उतार कर परिचारिका को दे दिये । वस्त्र परिर्वतन कर के स्नान वगैरह नित्य प्रवुतियो में जुड़ गये ।
तपोवन के द्वार पर तापस पंक्तिबद्ध खड़े रह गये थे। ‘आज वे महातपस्वी अग्निशर्मा , निर्विध्न पारणा करके , स्वस्थ हो कर लौटे तो सभी को शांति मिलेगी …।’ ऐसी शुभ कामनाएं करते हुए टाप्स लोग राजा के लिए भी कुशलता की कामना व्यक्त्त कर रहे थे ‘राजा को तनिक भी कष्ट न हो , राजा निर्मल चित्तवाला है… सरल है । साधु – संन्यासिजनो का परम भक़्त है । उसके तनमन कुशल रहें ।’
वहां उन्होंने दूर से धीमी गति से आ रहे अग्निशर्मा को देखा । संभवित समय के पूर्व ही और मंद गति से चल रहे अग्निशर्मा को देखकर तापसों का कलेजा दहल उठा …. ‘ओहो, क्या आज भी इन तपस्वी का पारणा नहीं हुआ ? अरे रे…. क्या दुर्घटना हो गई होगी ?’
अग्निशर्मा ने तपोवन में प्रवेश किया । सभी तापसों ने चिंतापुर वदन से अग्निशर्मा को प्रणाम किये । अग्निशर्मा ने भी दो हाथ जोड़कर सभी का अभिवादन स्वीकार किया ।
तापसों ने कुछ भी पूछा नहीं ।
अग्निशर्मा कुछ भी बोला नहीं ।
अग्निशर्मा के पीछे पीछे सभी कुलपति के निवास पर पहुँचे ।
अग्निशर्मा ने कुलपति के निवास में प्रवेश किया । कुलपति ने मधुर शब्दों में उसका स्वागत किया … और उसके सामने दो-चार पल देखा और पूछा : ‘वत्स, क्या आज भी पारणा नहीं हुआ ?’
अग्निशर्मा आसन पर बैठा । बनी हुई सारी घटना बताई और अंत में कहा :
‘भगवन, राजा का दुःख मुझसे देखा नहीं गया , इसलिए उसे शांति देने व उसका दुःख हल्का करने के लिए मैंने अब जो पारणे का दिन आयेगा… उस दिन उसके वहां से आहार ग्रहण करने की राजा की प्रार्थना का स्वीकार किया है ।’
‘वत्स, तूने उचित एवं उत्तम कार्य किया । गुणों के खजाने से राजा गुणसेन को वत्स, तूने बड़ी शांति दी । तपस्वीजन सचमुच परजन वत्सल होते हैं…और इसलिए ही वे सर्वजन वल्लभ होते हैं ।’
तापसों ने सारा वुतांत सुना ।
सभी के ह्रदय में अग्निशर्मा के प्रति आदरभाव बढ़ गया । आपस में वार्तालाप करते हुए, अग्निशर्मा के गुणों की प्रशंसा करते हुए वे अपने अपने स्थान पर गये ।
आगे अगली पोस्ट मे…