राजा ने भद्रासन पर बैठते हुए कहा :
‘देवी, घोर अनर्थ हो गया । वे महातपस्वी अग्निशर्मा , महल के द्वार पर पधारे थे…। कुछ देर खड़े भी रहे…। किसी ने उनको बुलाया नहीं… स्वागत नहीं किया….। हाथी-घोड़े की फ़ौज को देखकर वे भय से विक्षुष्ध होकर वापस लौट गये ।’
‘वापस लौट गये ? ओफ्फोह, यह तो बहुत ही बुरा हुआ । उनका पारणा नहीं हुआ…? उन्होंने तो आज ही से तीसरे महीने के उपवास प्रारंभ कर दिये होंगे ? नाथ । चलो…हम तपोवन में जाकर उन महात्मा से क्षमा मांग लें । और प्रार्थना करें कि ‘महात्मन, आपकी प्रतिज्ञा सच है…परंतु हर एक प्रतिज्ञा को अपवाद होता है…। अपवाद के सहारे भी आप वापस हमारे घर पर पधारें… एवं पारणा कर के हमारे संताप को दूर करें ।’
‘मैं उन्हें मिलकर आया ।’
‘तपोवन में गये थे ?’
‘नहीं, नगर के दरवाजे में ही वे मिल गये ।’
‘फिर ?’
‘तपस्वीजन प्रतिज्ञापालन में अत्यंत द्रढ़ एवं अडिग होते हैं देवी । उन्होंने वापस लौटने की तो स्पष्ट मनाही की , परंतु अब जब पारणे का दिन आयेगा तब वे अपने घर पर आकर आहार ग्रहण करेंगे ।’
रानी वसंतसेना गर्भवती थी । राजा ने कहा : ‘देवि, तुम संताप महसूस मत करो….। तुम चिंता न करो… मैं क्या करूं ? अचानक ही सैनिकों ने आकर, राजा मानभंग न किये हुए अपनी सेना के संहार के समाचार दिये…। वह सुनकर मैं उन महातपस्वी के पारणे को भूल ही गया….। फिर वही गलती दोहराई गई मुझसे ।
वर्ना, सबेरे जल्दी उठकर पहला कार्य तपस्वी के पारणे की पूर्व तैयारी करने का ही किया था ना ? परन्तु जब अशुभ होना हो तब कर्म जीवात्मा की सुध-बुध को आवुत कर लेता है । देवी….मुझे तो अशुभ होने की पदचाप सुनाई दे रही है ।’
राजा ने ठंडी आह भरी । रानी की आखों में आंख डालकर राजा ने कातर स्वर में कहा : ‘उस महात्मा ने तो मुझे क्षमा दे दी । उदारता का परिचय देते हुए तीन महीने के उपवास का पारणा अपने घर पर करने को मेरी प्रार्थना का स्वीकार भी किया । परंतु उन्हें कितनी देह पीड़ा होती होगी ? ऐसी घोर पीड़ा देनेवाले मेरा क्या होगा ? सचमुच, अक्षम्य गलती हो गई । वापस दुबारा भी वही गलती मैंने दोहराई । अपनी सेना के हत्याकांड के समाचार ने मुझे विह्मल सा बना डाला था …। चंचल और क्रोधी बना दिया था । और मैं उस महातपस्वी के पारणे को विस्मृत कर बैठा ।
आगे अगली पोस्ट मे….