जब तक राजा के महल में मैं पारणा नहीं करुंगा, तब तक इस महानुभाव का संताप दूर नहीं होगा । पहले भी कुलपति के समक्ष राजा ने यही बात कही थी। और कुलपति की आज्ञा से उस बात का मैंने स्वीकार भी किया था । अब भी इसकी आंखों के आंसू सूखे नहीं है। एक बड़े साम्राज्य का अधिपति इस तरह दुःखी हो-यह मुझ से देखा नहीं…. सहा नहीं जाता….।’ यों सोचकर उसने राजा से कहा :
‘महाराजा, स्वस्थ बनिए । संताप छोड़ दीजिए । अब यदि कोई अन्य निमित्त नहीं आएगा सामने , तो अब जो पारणा आयेगा वह पारणा आपके घर पर ही करुंगा। आपकी प्रार्थना का स्वीकार करता हूं । अब आप दुःखी मत होइये ।’
धरती पर पंचांग प्रणिपात कर के राजा गुणसेन ने गदगद स्वर में कहा :
‘भगवंत , मेरे पर अपने बहुत सारे उपकार किये हैं । आप निष्कारण वत्सल हैं । आप निर्मल ज्ञानद्रष्टिवाले हैं ….। मेरे दुःख को दूर करने का सही उपाय आपने जान लिया है ।मेरा दुःख दूर हो गया , मेरी अशांति दूर हो गई ….। आपका यह उपकार मैं कभी भी नहीं भूल सकता ।
महात्मन, अब आप तपोवन में पधारिये । मैं तपोवन में आज नहीं आ सकता । कुलपति को मैं मेरा मुँह दिखाने लायक नहीं रहा । मेरी लापरवाही से ही मैं कलंकित बना हूं….। उन पूज्य के श्रीचरणों में मेरी वंदना कहना । मैं जा रहा हूं ।’
राजा, मंत्री वगेरह परिवार के साथ राजमहल की ओर चला । अग्निशर्मा धीरे धीरे तपोवन की ओर बढ़ा।
राजा ने राजमहल के मुख्य प्रवेश द्वार में प्रवेश किया । वह वहां खड़ा रह गया….’यहां वे महातपस्वी आकर अकेले खड़े रहे होंगे । उन्होंने मुझे खोजा होगा…. क्यों वह तापसभक्त राजा नजर नहीं आ रहा ? और आज ये इतने सारे हाथी – घोड़े क्यों एकत्र हुए हैं ? वे कुशकाय महात्मा कितनी देर भला खड़े रह सके होंगे ? वापस लौट गये, और आज से तीसरे महीने के उपवास चालू कर दिये ।’
राजपुरोहित सोमदेव ने आकर राजा को प्रणाम कर के निवेदन किया :
‘महाराजा , युद्धयात्रा का अगला मुहूर्त देख लिया है। अब लग्नसमय में ज्यादा देर नहीं है । प्रशस्त लग्नसमय में प्रयाण करना है ।’
‘सोमदेव ।’ राजा गुणसेन ने गंभीर स्वर में कहा ।
‘मैं युद्धयात्रा के लिए प्रयाण नहीं करुंगा …। सेना के साथ सेनापति प्रयाण करेंगे ।’ महाराजा गुणसेन ने राजमहल में प्रवेश किया । सेनापति ने शुभ समय में सेना के साथ प्रयाण कर दिया ।
राजा गुणसेन सीधे ही अन्तःपुर में रानी वसंतसेना के पास पहुँचे । रानी को बड़ा आश्चर्य हुआ महाराजा को वापस आये देखकर । उसने खड़े होकर महाराजा का अभिवादन किया ।
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