विभावसु की मुत्यु के पश्चात कई दिनों के बाद मेरे परिवार ने मुझे प्रसन्न मुख-मुद्रा में देखा। सभी को आनंद हुआ। सभी के दिल शांत हो गये।
मैंने मेरे माता – पिता से कहा :
पर्वत की गुफा में चार महान तपस्वी मुनिवर पधारे हैं। उनके दर्शन कर के सचमुच, मे मैं धन्य बन गया । उनकी वाणी सुनकर हर्षविभोर हो उठा। वे चार महीना उसी गुफा में रुकेंगे और साधन करेंगे। महीने महीने के उपवास कर के वे वहां रहेंगे। मैं प्रतिदिन उन महात्माओं के दर्शन करने के लिए जाऊंगा, उनकी सेवा करूंगा। उनकी धर्मवाणी सुनुंगा। इससे मेरे मन को अपूर्व शांति मिलेगी। प्रसन्नता प्राप्त होगी ।’
माता पिता ने प्रसन्न होकर इजाजत दी। मैंने भोजन किया। मेरे खंड में आकर विश्राम किया। मेरे मन में…षमेरी कल्पना में उन चार मुनिवरों के अलावा और कोई आया ही नहीं। रात में भी उन्हीं के विचारों में खोये खोये कब मुझे नींद ने आ घेरा… मुझे पता भी नहीं लगा ।
दूसरे दिन सबेरे नित्यक्रम से निपटकर, अश्वारूढ़ होकर मैं उन मुनिवरों के पास पहुँच गया ।
मुनिवरों के चरणों में मैंने आनंदपूर्व अन्त:करण से वंदना की। उन्होंने मुझे धर्मलाभ का आशीर्वाद दिया । चारों मुनिओं को वंदना कर के उनसी कुशलपुच्छा की। ततपश्चात विनयपूर्वक उनके समक्ष बैठ गया ।
तीन मुनिवर स्वाध्याय में लीन थे। मैं ज्येष्ठ मुनिवर के पास बैठा हुआ था। मैंने उनसे प्रश्न किया :
‘महात्मन, धर्म का प्रारंभ कहां से-कैसे होता है ?’
‘धर्म का प्रारंभ होता है श्रद्धा से ।’ उन्होंने संक्षिप्त प्रत्युत्तर दिया ।
‘प्रभो, श्रद्धा का सही स्वरुप समझने की कृपा करेंगे ?’
‘अरिहंत ही मेरे परमात्मा , जिनाज्ञा के पालक साधुपुरुष ही मेरे गुरु और सर्वज्ञ प्रणित धर्म ही मेरा धर्म है…; इस प्रकार की द्रढ़ मान्यता को श्रद्धा कहते हैं ।’
‘अरिहंत कैसे होते हैं ?’
आगे अगली पोस्ट मे….