अशोकदत श्रेष्ठि का अशोकवन , क्षितिप्रतिष्ठित नगर की शोभा थी । राज्य के उघान से भी अशोकवन ज्यादा सुंदर, ज्यादा विशाल था ।
— न्याय और नीति के पालन के द्रढ़ आग्रही राजाओं के जीवन में ज्यों एकाध भी दोष का छिद्र देखने को नहीं मिलता , त्यों उस उघान में अम्रवुक्षों की घनी घटा में सूर्यकिरण को प्रवेश करने का कोई छिद्र नहीं था ।
— ज्यों सत्पुरुष परायी स्त्री के सामने नीची निगाह रखकर खड़े रहतें हैं, त्यों रमणीय वाटिकाओं के तट पर वुक्ष अपनी डालियाँ झुका कर खड़े थे ।
— सज्जन पुरुषों की ह्र्दयभूमि पर ज्यों परहित की चिन्ताएं टेढ़ी-मेढ़ी बिछी हुई रहती हैं…. त्यों उस उघान की भूमि पर अतिमुक्त की लताएँ इतस्ततः छितरायी हुई बिछी थी ।
— ज्यों दरिद्र – कामी – विकारी पुरुषों के दिल व्याकुल रहते हैं … त्यों उस उघान के लतामंडप, विलासी पुरुषों के विरह में व्याकुल हुए थे ।
— लाल वस्त्रों में सज्ज नववधू ज्यों राजमार्ग पर जाती हुई शोभा देती है… त्यों उस उघान के राजमार्ग पर अशोक वुक्ष प्रतीत हो रहे थे ।
ऐसे अशोकवन– उपवन में, निर्जीव भू–भाग पर विशाल मुनिवुन्द के साथ आचार्य श्री विजयसेन बिराजते थे । प्रभात की वेला में मुनिवर स्वाध्याय — ध्यान में लीन थे , उस समय महाराजा गुणसेन सपरिवार उस उघान में प्रविष्ट हुए ।
उन्होंने चंद्र जैसे सौम्य–शीतल आचार्य श्री की आत्मकथा के दर्शन किये । राजा की देह रोमांचित हो उठी । उसके आनंद की सीमा नहीं रही । आंखों में ख़ुशी के आंसू छलक आये । उन्होंने आचार्य के चरणों में विनयपूर्वक पंचांग प्रणिपात किया ।
आचार्य श्री विजयसेन ने राजा को ‘धर्मलाभ’ का आशीर्वाद दिया । ‘धर्मलाभ’ का शब्द – ध्वनि श्रुतिपट पर टकराते ही राजा गुणसेन को महसूस हुआ कि जैसे उनके शारीरिक — मानसिक तमाम दुःख दूर हो गये हों।
आचार्य श्री को वंदना करने के पश्चात , परिवार सहित महाराजा ने सभी मुनिवरों को भावपूर्वक वंदना की , कुशलपुच्छा की , और इसके बाद आचार्य को प्रणाम कर के विनयपूर्वक आचार्य श्री के समक्ष बैठे।
आचार्य श्री के अदभुत रुप और स्वच्छ चरित्र पालन की अलौकिक प्रतिभा से महाराजा बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने आचार्य श्री से कहा :
‘भगवंत, मेरे मन में एक जिज्ञासा जगी है, यदि आप की इजाजत हो तो मैं मेरी जिज्ञासा व्यक्त्त करुं ?’
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