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आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 4
मेरे स्वजन जानते थे कि हम दोनों मित्रों को साधुपुरुषों के पास जाना… उनका परिचय करना… उनकी सेवा करना अच्छा लगता था । एक दिन मेरे कमरे में मैं निराश- गुमसुम सा बैठा था। इतने में महामंत्री ने आ कर मुझ से कहा : ‘कुमार, तुम्हें अच्छे लगे वैसे एक समाचार देने के लिए आया हूं।’ मैंने खड़े होकर महामंत्री…
आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 3
‘महाराजा, डर – शोक – रोग और प्रियजन वियोग वगैरह दुःखों से आक्रान्त इस मनुष्य लोक में सुख है कहां ? है तो कितना है ? केवल सुखाभास है। निरी मायामरीचिका है। इन्द्रजाल है ।’ राजा गुणसेन ने कहा : ‘भगवंत, ऐसी ज्ञानद्रष्टि , आपने किसी प्रसंग-घटना के द्वारा या कोई निमित्त पाकर प्राप्त की होगी ना ? या फिर…
आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 2
आचार्य श्री के अदभुत रुप और स्वच्छ चरित्र पालन की अलौकिक प्रतिभा से महाराजा बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने आचार्य श्री से कहा : ‘भगवंत, मेरे मन में एक जिज्ञासा जगी है, यदि आप की इजाजत हो तो मैं मेरी जिज्ञासा व्यक्त्त करुं ?’ ‘राजन, तुम अपनी जिज्ञासा कर सकते हो ।’ दो पल खामोश रहकर, महाराजा ने आचार्य श्री…
आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 1
अशोकदत श्रेष्ठि का अशोकवन , क्षितिप्रतिष्ठित नगर की शोभा थी । राज्य के उघान से भी अशोकवन ज्यादा सुंदर, ज्यादा विशाल था । — न्याय और नीति के पालन के द्रढ़ आग्रही राजाओं के जीवन में ज्यों एकाध भी दोष का छिद्र देखने को नहीं मिलता , त्यों उस उघान में अम्रवुक्षों की घनी घटा में सूर्यकिरण को प्रवेश करने…