एक बार किसी हवाई जहाज में यात्रा करने वाला यात्री दुर्घटनावश अत्यन्त ऊँचाई से नीचे गिर जाता है । अब आप समझ ही सकते हैं कि इतनी उंचाई से गिरते हुए उसके मन में किस तरह के विचार आ रहे होंगे l
क्या ऐसी विकट परिस्थिति में वह उस समय दूसरों के दोष देखेगा, अपने अभिमान में चूर होगा ? उसे तो किसी भी तरह के आमोद-प्रमोद का, खाने-पीने का विकल्प भी नहीं उपजेगा। वह तो गिरते ही तत्क्षण समझ जायेगा कि अब मौत अत्यन्त निकट है । फिर वह बचाओ-बचाओ चिल्लायेगा, किन्तु उसका क्रंदन कोई भी नहीं सुनता है l
तब वह व्यक्ति नीचे गिरते हुए अत्यन्त आकुलित होता हुआ मरण को प्राप्त होता है l
हे आत्मन्, आप भी इस घनघोर कर्म के वायुमंडल में पूर्वजन्म के पुण्य से चतुर्गति के सर्वोत्कृष्ट मनुष्य भव की इस ऊँचाई पर पहुँच चुके हो । अब इस भव में और ऊपर जाने का यानी कि सम्यकदर्शन को पाने का कोई भी कार्य या पुरुषार्थ आपने नहीं किया है l
अतः अब आप इस सर्वोत्कृष्ट पुण्य की उंचाई से नीचे गिर रहे हो । लेकिन आपने इतनी मोह रूपी मदिरा पी ली है कि आप बेहोश हो गये हो और बचाओ-बचाओ भी नहीं चिल्ला रहे हो l
_हे भव्यात्मा, फिर भी परमोपकारी श्री सद्गुरू अत्यन्त करूणा से ज्ञानजल के छींटे मारकर आपको जगा कर समझा रहे हैं कि अब भी वक्त है, मेरे पास आ जाओ. मैं आपको आपके ही अनन्त गुण रूपी घोड़ों से जुते इस अतिवैभवशाली विशालकाय अलौकिक चैतन्यरथ में चढ़ा देता हूँ, जिससे फिर आप को कभी भी गिरने का भय नहीं रहेगा और आप इस चैतन्यरथ पर विराजमान सदाकाल इस अद्भुत वैभव को भोगकर शाश्वत सुख को पा लोगे l_
_अतः हे देवानुप्रिय, अब शीघ्र ही “चेत रे भाई चेत” और अपने आपको समझदार और श्रेष्ठ मानकर दूसरों को दोष देना छोड़कर इस स्वप्न-अवस्था को जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी त्यागकर अब तो जाग जाओ l_
_तब फिर शीघ्र ही आपका कल्याण होगा l_
