जिसमें जेवर ही नहीं, ऐसा मखमल का बॉक्स कितना ही अच्छा दिखाई दे
पर उसकी कीमत कितनी ?
जिस में जीव नहीं, ऐसा मृतदेह चाहे कितना ही सूंदर हो कौन उसे अपने पास रखता है?
जिन दानो को कीड़े खा चुके हो, उनके बाकी बचे हुए छिलकों की कीमत कितनी?
हमारा यह संसार भी कुछ ऐसा ही है, मखमल के बॉक्स जैसा, सुन्दर मृतदेह जैसा या बचे हुए छिलकों जैसा। बाहर से कितना ही सुन्दर दिखे पर अंदर से बेकार ही है।
मन:- चाहे संसार में कोई सार न हो, पर इसमें कुछ नुकसान भी नहीं है,
मखमल का बॉक्स भले ही खाली है पर बच्चों के खेलने के काम आ सकता है,
सुन्दर मृतदेह किसी डॉक्टरी पढ़ रहे विद्यार्थी को प्रयोग के काम आ सकता है
और छिलके गरीबों के या कम से कम पशुओं के खाने के काम आ ही सकते है।
इस संसार में और कोई सार हो न हो पर मेरे जैसे को इससे बड़ी ही शांति मिलती है।
होश गुम हो ऐसा संगीत! नशा चढ़ जाए ऐसा रूप! मन बहक जाए ऐसी खुशबुएँ! मोक्ष का सुख भुला दे ऐसा स्वादिष्ट भोजन! और संसार का सर्वोत्कृष्ट गिना जाने वाला अब्रह्म का सुख।
अरे भाई इतना तो मिल ही रहा है फिर चिंता किस बात की।
आत्मा का जवाब-: संसार असार है, इतना ही होता तो एक बार तेरी ( मन की ) मान भी लेते पर ऐसा नहीं है। संसार डरावना है, यह इसका दूसरा रूप है, क्यों ?
क्योंकि इसने बेहिसाब रोग भरे पड़े है, और अनगिनत मानसिक वेदनाएं है।
तू जिन भोग और सुखों की बात कर रहा है वह तो मात्र पल दो पल के है। पर उनके सामने जो दुःख भरे पड़े हुए है वह तो याद करके भी कंपकपी छूट जाती है।
संसार में पाप करने से पाप कर्म बंधते है और उनके उदय से भविष्य नें दुर्गति और दुःख मिलते है- अगर यह बात एक बार छोड़ भी दे तो भी इस संसार में प्रत्यक्ष जो दुःख और वेदनाएं है
वह भी कम नहीं है।
जिस तरह तीर्थ वंदना या सु-गुरु रूपी जंगम तीर्थ की यात्रा करते है वैसे ही एकबार किसी अस्पताल के दर्शन भी कर आओ और अपने आप को उनकी जगह सिर्फ सोच कर देखो । कितनी पीड़ा है।
