वीर अपने आप में एक अ-वर्णनीय व्यक्तिव l इनके द्वारा बताये पथ पर चलकर ही सिद्धत्व की प्राप्ति होना संभव है l और इस पथ में कोई शॉर्टकट नहीं है l
हम सब को सिद्धत्व तो चाहिये पर इनके द्वारा बताया गया पथ हमे दुष्कर लगता है l हम सब चाहते है की सिद्धत्व तो प्राप्त हो पर पथ आसान हो जाए l हम जैसे जी रहे है , वैसे ही जीते रहे, हमारे स्वभाव में कोई बदल ना करना पड़े और हमे सिद्धत्व भी मिले l
पर क्या ऐसा संभव है ? नहीं कदापि नहीं l
समकित की प्राप्ति के बाद अगले भवों में वीर के जीव ने अपने कुल का मद किया, किसी संगीतकार के कानों नें ज्वलनशील ( धगधगता ) सीसा डलवाया, बलवान बन किसी जीव से बदला लेने के लिए नियाणां किया l और इस प्रकार कर्म का बंधन भी किया l और कई कर्मों का उदय आया वर्धमान के भव में l
इस भव में चूँकि वे तीर्थंकर यानी की अपने चरम भव या कहो आखरी भव में थे l तीर्थंकर होते हुए अथाह बल के स्वामी भी थे l इस संपूर्ण लोकालोक में किसी की भी ऐसी शक्ति नहीं थी की उन्हें हरा सके l इतना होते हुए भी अपने कर्मों का उदय आने पर उन्होनें कभी भी अपनी शक्ति या बल का प्रयोग नहीं किया l अपनी आत्मा में लीन रहे और जो भी उपसर्ग आये उन्हें बिना किसी प्रतिवाद के सहन करते रहे l
शायद यह कहना अनुचित नहीं होगा की तीर्थंकर के जीव पर इनके जितने उपसर्ग किसी और पर नहीं हुए l पर इनके भाव उपसर्ग करने वाले के विरुद्ध कभी नहीं हुए l अपने पर हुए उपसर्गों को कर्मों का फल समझ कर शांत मन से सहते रहे l यही वजह थी की वे तीर्थंकर पद को प्राप्त कर मोक्ष गए l
पर हम क्या करते है ?
हम हर बात का प्रतिवाद करते रहते है l कोई हमे कुछ कह दे, या हमारे साथ कुछ बुरा कर दे तो हम सह नहीं पाते है l हम उस व्यक्ति के प्रति क्रोधित हो जाते है l क्षमा करना तो दूर की बात है, हम कैसे बदला ले सके ईस मौके की तलाश में रहते है l ऐसा करेंगे और सोचेंगे तो कैसे और किस भव में हमारी मुक्ति होगी इस पर ही सवालिया निशान लग जाता है l
मैं स्वयं भी ऐसा ही हूँ l
मानता हूँ की पंचम काल में हम सब वक्र हो चुके है l और पंचम काल में हमारा मोक्ष भी संभव नहीं है l पर फिर भी कुछ तो ऐसे पुण्य किये होंगे जो हमे यह मनुष्य भव मिला और ऊसके साथ ही वीर का शाशन मिला l
इस भव को युहीं व्यर्थ जाने देने से अच्छा है कि हम अपने पुरुषार्थ की ओर सतर्क हो जाए l जितना ओ सके हमारे वक्र स्वभाव को संतुलित कर उसे सौम्य बनाने की कोशिश करे l किसने क्या कहा, किसने क्या किया, कौन कैसे क्या कर रहा है, इन बातों पर ध्यान देने की बजाय अपने आत्मा स्वभाव को संतुलित और सरल बनाने की कोशिश करे l पता नहीं ऐसा भव और धर्म हमे आगे कब मिलेगा, इसलिए इसी भव में अपने आप को बदलने की कोशिश करे l सिर्फ पथ की बातें करने से अच्छा है की हम उसपर चलने की कोशिश प्रारम्भ कर दे l यह ऐसा दुष्कर काल है की हमारा पुरुषार्थ कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है l इसलिए अभी से अपने पुरुषार्थ की सक्रियता यथाशक्ति बढ़ाने की कोशिश कर दे l
मैं भी करू और आप सब भी करे l
