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श्री गौतमस्वामी के पूर्वजन्म छटा भव: श्री गौतम स्वामी

तू जम्बूदीप के भरतक्षेत्र में पेदा हुआ।भरतक्षेत्र में साढे पच्चीस आर्यदेश हे।उन देशो की महान सत्ता समान मगध देश में तथा उसके गोबर नामक गाँव में वसुभूति नमक ब्राम्हण का तू पुत्र हुआ।तेरी माता का नाम पृथ्वी और तेरा नाम इंद्रभूति था।उसके बाद तेरे जीवन की गंगा में जो प्रवाह आये वे तेरी आँखो के सामने हे।आज तू मेरा प्रथम गणधर बना उसमे पहले के भावो की साधना की श्रृंखला भी कारणभूत हे।धिसखा मंत्री की आत्मा आठवे देवलोक आयुष्य करके मृत्यु को प्राप्त हुई। इसी भरतक्षेत्र में चंपा नामक नगरी में पेदा हुई।पिताजी का नाम तिलकसेठ तथा माता का शीला वति ।उन दोनों का पिंगल नाम का गुणवान पुत्र हुआ।समयनुसार वह जवान हुआ।चम्पानगरी में जब मेंरा समवसरण बना तब मेरी देशना सुनकर वेराग्यवासित बन गया।मेरे पास संयम लिया।सुन्दर ग्रहण आसेवंन शिक्षा प्राप्त की तथा वह श्रुतकेवली चोदहपूर्वधर के रूप में विधमान हे।दूसरी तरफ धनमाला का आयुष्य पूर्ण होते ही उसका आठवें देवलोक से च्यवन हुआ।इसी भरतक्षेत्र में ससुंवर नमक गाँव में राजकुमार के रूप में पेड़ हुआ ।पिता का नाम सिद्ध माता समृध्दि तथा धनमाला के जीवन का नाम स्कंदक ।स्कंदक कुमार जवान हुआ तब किसी परिव्राजक की देशना से प्रभावित हुआ। संसार का त्याग करके उसने अज्ञानता के वश होकर परिव्राजक के पास दिक्षा ली ।श्रुतकेवली पिंगल मुनि मेरी आज्ञा पाकर इस स्कंदक के आश्रय में पहुँचे ।पूर्वभव के पराम् से प्रभावित होकर उन्होने स्कंदक को जिव अजीव तत्व के बी में में पूछा परंतु सम्यग्ज्ञान का अभाव होने से स्कंदक कोई भी जवाब नही दे सका।कहा श्रुतकेवली का मनोवगहि ज्ञान तथा कहाँ मित्यामति मे रहा हुआ ज्ञानाभास इस समय स्कंदक खूब शंकाकुल बनकर तत्व का सच्चा समाधान प्राप्त करने के लिये उत्सुक बना और इसीलिए पिंगलमुनि के साथ मेरे पास आ रहा हे।प्रभुने विश्राम ग्रहण किया।श्री गोतमस्वामी स्कंदक के सामने से आ रहे श्री गौतम स्वामी का आदर किया ।

प्रभु की पास जाकर संशय का समाधान प्राप्त किया तभी स्कंदक

को सत्य तो सिर्फ जिनप्रणीत संयम में ही हे ऐसी द्रढ श्रद्धा हुई।परिव्राजक की दिक्षा छोड़कर उसने महावीर प्रभु के पास लोकोतर दिक्षा स्वीकारी।

श्री गोतमस्वामी के पूर्वजन्म पाचवा भव: आठवें देवलोक के इंद्र।
December 19, 2017
कर्ज
December 19, 2017

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