महारानी ने मंत्री यशोधन को पास बुलाकर , अग्निशर्मा तापस के आगमन के बारे में तलाश करने की सुचना दी। यशोधन त्वरा से राजमहल के मुख्य द्वार पर गया। वहां उपस्थित मानवसमुदाय में अग्निशर्मा को खोजने लगा।
उसे वहां अग्निशर्मा नहीं दिखाई दिया….। तो उसने वहां पर खड़े नागरिकों से पूछा :
‘भाई, यहां पर एक दुबला-पतला गोरूए वस्त्रधारी तापस आया था क्या ? तुम में से किसी ने उन्हें देखा है ?’
‘मंत्रीश्वर , हाँ , आप कहते हैं… वैसे तापस आये जरूर थे। कुछ समय यहां खड़े भी रहे । बारबार राजमहल की ओर देख रहे थे । परंतु राजपरिवार में से किसी ने उन्हें बुलाया नहीं,…. इसलिए वे वापस लौट गये । पर मंत्रीश्वर, हमें यह बताइये, की महाराजा की शिरोवेदना कम हुई या नहीं ?’
‘भाई , महाराजा को शिरोवेदना दूर हो चुकी है । महाराजा स्वस्थ हैं।आप सभी अपने अपने घर पर लोट जाईये। महाराजा अब एकदम ठीक हैं ।’
मंत्री ने महाराजा के शयनखंड में आकर विनयपूर्वक निवेदन किया… .’महाराजा, वे कुशकाय तपस्वी राजमहल के द्वारा पर आये जरुर थे….’
‘तुम उन्हें महल में ले आये हो ना ?’ राजा ने उत्सुकता से पूछा ।
‘महाराजा, आपकी शिरोवेदना ने पुरे राजपरिवार को परेशान कर डाला था…। पूरा परिवार किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था। किसी को भी क्या करना , सूझ ही नहीं रहा था । और फिर , परिवार के किसी सदस्य को महातपस्वी की प्रतिज्ञा के बारे में पूरी जानकारी नहीं थी , इसलिए किसी ने उनकी आवभगत की नहीं….। इसलिए कुछ देर वे राजमहल के द्वार पर खड़े रहे …. और फिर कुछ उद्विग्न हुए वे वहां से वापस लौट गये ।’
रानी वसंतसेना के सामने देखकर राजा ने चिंतापुर होकर कहा : ‘देवी, घोर अनर्थ हो गया। वे महात्मा अब पारणा नहीं करेंगे। अपनी प्रतिज्ञा पालन में वे बड़े दृढ़ हैं। उन्होंने आज ही से दूसरे महीने के उपवास चालू कर दिये होंगे।
ओह , मेरी कितनी बदकिस्मती ? मैंने उन महातपस्वी को कितना कष्ट दिया? कितनी पीड़ा दी ?’ राजा की आंखे गीली हो उठी ।’
‘नाथ, हम कर भी क्या सकते हैं ? कितनी असह्म शिरोवेदना से आप परेशान थे ? ऐसी वेदना में पारणे की बात स्मृति में नहीं रहे….यह स्वाभाविक है । किसी को खाना – पीना भी नहीं सूझ रहा था …। उसमे तपस्वी का पारणा भला याद किसे रहेगा ? अपने जानबूझ कर पारणा नहीं करवाया….वैसी बात तो है नहीं । फिर क्यों आप इतना अफ़सोस कर रहे हैं ?’
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