महाराजा बड़े ही भावुक है। भक्तिभाव से भरे हुए हैं । आपका पारणा नहीं करवाने का उन्हें काफी रंज होगा…. चिंता होगी ।’
अग्निशर्मा ने कहा : ‘गुरुसेवक और गुरुपूजक वैसे उस महानुभाव को शीघ्र ही आरोग्य प्राप्त हो….। मुझे तो आप पारणा करना ही नहीं है। आज से दूसरे महीने के उपवास की प्रतिज्ञा करता हूं ।’
राजमहल के द्वार से अग्निशर्मा वापस लौटा , तपोवन की ओर चला…. और इधर वैघों के, मांत्रिकों के , एवं तांत्रिकों के श्रद्धापूर्वक किये गये प्रयत्नों का परिणाम दिखने लगा ।
‘महाराजा की शिरोवेदना कम हुई। अस्वस्थता भी कम हुई। उन्होंने महारानी से कहा : ‘देवी, अब मुझे ठीक लग रहा है , सभी से कह दो कि अपने अपने नित्यक्रम में लग जाए ।’
महारानी की आंखों में ख़ुशी के आंसू छलक आये । उन्होंने कहा : ‘कुलदेवता ने मेरी प्रार्थना सुन ली ।’
‘देवी’, कहते हुए महाराजा पलंग पर बैठ गये…। महारानी चोंक उठी । उन्होंने महाराजा के दोनों हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा :
‘क्या हुआ, नाथ, आपको ?’
‘देवी, आज उन महातपस्वी अग्निशर्मा का पारणा है न ? क्या वे महातपस्वी महल में आ गये ?’
‘नाथ, मुझे कुछ भी मालूम नहीं है….। मैं इस कमरे से बाहर गई ही नहीं हूं ….। मैं मंत्री को तलाश करने के लिए कहती हूँ ।’
‘और…. कहना कि यदि वे महातपस्वी महल के द्वार पर खड़े हों तो उन्हें मधुर वचनों से निमंत्रित करके महल में ले आये । मैं स्वयं अपने हाथों से उन्हें पारणा करवाऊंगा ।’
राजवेघ ने दो हाथ जोड़कर , नमन कर के कहा :
‘महाराजा , आपकी शिरोवेदना दूर हो गई… इससे हम सभी को बहुत ही आनंद व संतोष हुआ है। परंतु कृपा कर के आप आज के दिन तो पूरा आराम ही कीजिए।
‘वैघराज, मैं आराम ही करूंगा…., परंतु उन महातपस्वी को पारणा तो करवाऊंगा ही ।’
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