राजा ने कहा :
‘भगवंत, मैंने उन महात्मा को महीने के उपवास का पारणा करने के लिए निमंत्रित किया तो सही…. पर प्रमाद के कारण उन्हें पारणा करवा नहीं सका …. यही मेरे घोर संताप का कारण है ।’
‘राजन, ऐसा प्रमाद कैसे हुआ ?’
‘प्रभु, मेरे मस्तिष्क में अतिशय वेदना पैदा हो गई … इसलिए मैं तो परवश हो गया था । मेरे परिवार को , पारणे के बारे में सुचना देना भी मैं प्रमाद के कारण भूल गया । उन महात्मा का पारणा नहीं हुआ । मैं उनके लिए आहार में अंतराय-विघ्न करनेवाला हुआ । साथ ही उनके धर्म में भी विघ्न रूप हुआ…. इस बात का मुझे भारी रंज है ।’
‘वत्स, इसमें तेरा अपराध नहीं है । तीव्र वेदना की क्षणों में मनुष्य को अपने कर्तव्यों की स्मृति न रहे , यह बिल्कुल स्वाभाविक है। और फिर उसका पारणा न होने से धर्म का अन्तराय नहीं हुआ है , परंतु उसके लिए तो तप संपति की वुद्धि हुई है। अतः राजन, उद्वेग न कर… अफ़सोस मत कर… संताप मत रख दिल में।’
‘ भगवंत , आपका ह्रदय वास्तव में मातुह्र्दय है । आप दयालु हैं, कुपालु हैं , आप मेरी गलती को , मेरे अपराध को गल्ती मानते ही नहीं हैं , आपकी यही तो महानता है । परंतु मुझे मेरी गल्ती का अहसास तो हो ही रहा है । मैं बहुत बड़ी गलती कर बैठा हूं। ‘
‘वत्स , तेरा इस तरह का उद्वेग…. संताप…. मुझे और इन सभी तापसों के दिल को दुःखी कर रहा है । इसलिए उचित यह होगा कि किसी भी तरह तेरा संताप दूर होना चाहिए ।’
‘भगवंत , जब तक वे महातपस्वी मेरे घर – आंगन में पधार कर ग्रहण न करे… तब तक मेरी पीड़ा भला कैसे दूर हो सकती है ? और महात्मा ने तो उनकी पूर्व प्रतिज्ञा के मुताबिक आज ही से दूसरे महीने के उपवास शुरु कर दिये होंगे । अब मेरे वहां पधार कर आहार लेने का मुमकिन ही कहां है ?
‘राजन, जब दूसरे महीने के उपवास का पारणा आयेगा…. तब यदि कोई विघ्न नहीं आयेगा तो मेरे महल में वह महानुभाव अवश्य पारणा करने आएगा ।’
‘प्रभु । आपकी इस कृपा से मैं धन्य हो उठा । दो महीने के उपवास का पारणा करवाने की इजाजत मुझे देकर , आपने मुझे शोकसागर से पार उतार दिया है । आपका अनुग्रह असीम है ।’