हमेशा अन्य जीवों के गुण देखने चाहिए …, गुणानुवाद करने चाहिए और गुणवानों की प्रशंसा करनी चाहिए । किसी के दोष नहीं देखना , किसी के दोष प्रगट नहीं करना । सदैव प्रिय एवं सत्य वचन ही बोलने चाहिए । हितकारी और कल्याणकारी वचन बोलने चाहिए ।
मन में अच्छे विचार करना । परमात्मा का ध्यान करना । सत्पुरुषों का समागम रखना । ज्ञानिपुरुषों को सन्मान देना – आदर देना । ज्ञानीजनों से ज्ञान प्राप्त करना ।
सभी जीवों को मित्र मानना । कभी किसी को शत्रु नहीं मानना । अन्य जीवों के दुःख दूर करने की कोशिश करना ।’
महारानी वसंतसेना का रथ तपोवन में प्रविष्ट हुआ। आगे महामंत्री का अश्व था। कुलपति की पर्णकुटी के सामने आकर रथ खड़ा रहा। महारानी वसंतसेना रथ में से उतरी…. कुलपति की पर्णकुटिर में प्रवेश करके कुलपति का अभिवादन करते हुए उनकी कुशलपुच्छा। कुलपति ने रानी को आशीर्वाद दिये ।
परिचारिका ने रथ में से एक के बाद एक – ग्यारह स्वर्णमय थाल लाकर पर्णकुटी में रखे । रत्नजड़ित स्वर्णकलशो में केसर – इलायची अदि उत्तम द्रव्यों से मिश्रित दूध था। ग्यारह कलश भी पंक्तिबद्ध रुप से जमा दिये ।
राजा ने सर्वप्रथम सुंगधित पानी से कुलपति का चरण – प्रक्षालन किया । इसके बाद दूध और पक्वान्न अर्पण किये। इसके बाद संन्यासी के लिए उचित वस्त्र वगेरह अर्पण किये । तपोवन के कार्यों के लिए ग्यारह सहस्र स्वर्णमुद्राएं भेंट की ।
पूजा-भक्त्ति कर के , राजा ने पुनः कुलपति से प्रार्थना की :
‘भगवन , कल मेरा आंगन पवन कीजिएगा। साथ ही अग्निशर्मा महातपस्वी के अलावा सभी तापसों को लेकर पधारिएगा ।’
‘राजन, तुम्हारी प्रार्थना का स्वीकार किया हुआ ही है।’
‘महात्मन, एक बात कहनी रह गई। महातपस्वी अग्निशर्मा को पाँच दिन के बाद महीने के उपवास का पारणा आता है । मैंने उन्हें मेरे घर पर पधारने के लिए बिनती की है। उन्होंने मेरे पर अनहद कुपा करके , मेरी प्रार्थना स्वीकार की है।’
‘राजन , तुम पुण्यशाली हो । वह तपस्वी पारणे के दिन तुम्हारे राजमहल पर आ जाएगा। उसकी प्रतिज्ञा याद रखना ।’
कुलपति आर्य कौडिन्य ने प्रसन्नवदन से राजा – रानी को आशीर्वाद देकर बिदाई दी। राजा – रानी रथ में बैठ और परिवार के साथ वे नगर की ओर रवाना हो गये।
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