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क्षितिप्रतिष्टित नगर में – भाग 9

राजा ने कल्याणक को अपने निकट बुलाकर,उसके सिर पर हाथ रख कर कहा। वत्स, सचमुच तू पुण्यशाली है कल्याणक।तूने तेरी इन दो आँखो को उस महापुरुष के दर्शन से धन्य बना दी। यदि कोई विघ्न नही आया तो कल सवेरे में उन आचार्य भगवंत के दर्शन करने लिये जाऊँगा। महाराजा ने कल्याणक को प्यार से रत्नहार अर्पित किया। सभा का विसर्जन किया। एक सप्ताह के दीर्घ और उबाऊ प्रवास से महारजा गुणसेन थक गये थे। वसंतपुर से क्षितिप्रतिष्ठित पहुँचते पहुँचते वे बुरी तरह थक चुके थे। तन-मन से वे काफी थकान महसूस कर रहे थे। नगर के श्रष्टीगणऔर राजममंत्रीयो की सतत आवाजाही से दिन काफी व्यस्तता में बीता। रात्री का प्रारंभ हुआ। महाराजा गुणसेन जैसे ही पलंग पर लेटे कि नींद ने उन्हें आ घेरा। दो प्रकार की गहरी नींद पूरी होने पर, मध्य रात्री के समय उनकी नींद खुल गई। शयनखंड में घी के स्वर्ण दीपक धीरे धीरे मद्धिम से जल रहे थे।शयनखंड के बाहर सशस्त्र सैनिक पहरा दे रहे थे।महाराजा पलँग पर बैठ गये। एकांत था। नीरव शान्ति थी। उनके मन मे राजसभा में कल्याणक ने आचार्य विजयसेन का दिया हुआ शाब्दिक परिचय साकार हुआ। मानस पट पर एक अनजान पर जैसे कि चिर परिचित सी आकृति उभरने लगीं। अमावस की गहन अंधेरी रात में भी कुछ तारे आकाश में चमकते है वैसे मेरे दुर्भाग्य की अँधेरी जीवन रात्री मे पूण्य के कुछ दो-चार तारे दभकते है। आज यहाँ आने के साथ ही मुझे कैसे मंगलमय और कल्याणकारी समाचार मिले।मेरे नगर प्रवेश के दिन ही वे महात्मा विजयसेन आचार्य भी नगर में पधारे। कैसा संजोग। कैसी भवितव्यता। वे आचार्य भरजवानी में है। विकारहित है, कामविजेता है। क्षमा और वात्सल्य के सागर है।साक्षात धर्ममूर्ति है। त्रिकालज्ञानी है। ऐसी विरल विभूति के दर्शन मेने तो आज दिन तक कभी किये हीं नही। हा, तपोवन में जरूर आर्य कौडिन्य के दर्शन किये पर वे व्रद्ध है। युवान नही। वे तपस्वी है, पर त्रिकाल ज्ञानी नहीं है। वे अविकारी है पर अत्यंत रूपवान नही है। ये विजयसेन आचार्य में तो रुप,ज्ञान और युवानी का सुभग समन्वय हुआ है। रुप-लावण्य और पूण्य का पुनित संगम हुआ है। कितनी कमनीय उनकी देहकृति होगी ?कल्याणक ने कहा था कि वे राजकुल में जन्मे थे। राजकुमार थे। फिर वे राजसी सुख वैभव को त्याग कर क्यों साधु बन गये होंगे ? उन्हें ऐसा तो कौनसा दुःख भोगना पड़ा होगा ? कुछ भी दुःख आया होगा। यह संसार यह जीवलोक दुःखो की बहुलता से ही तो भरा है। इसलिए क्या वे वैरागी हुए होंगे ? मै कल सवेरे उन महात्मा के दर्शन के लिए जाऊँगा। उनके वैराग्य का कारण पुछुगा। उनके श्री मुख से मधुर धर्मदेशना सुनूंगा। कैसी मधुर उनकी वाणी होंगी ?पुण्यशाली सौभाग्यशाली महापुरुषों की वाणी शक्कर से भी ज्यादा मधुर होती हैं और चंदन से भी ज्यादा शीतल होती है। उसमें भी, ये तो करुणा की कल कल बहती सरयू जैसे साधुपुरुष है। साधुपुरुषो की वाणी भी कितनी मधुर थी कितनी शीतल थी। नगर में घोषणा करवा दूँगा। अशोकदत्त श्रेष्ठि के नंदनवन से अशोकवन में विराजमान त्रिकाल ज्ञानी आचार्य विजयसेन के दर्शन करने के लिए एवं उनकी धर्मवाणी सुनने के लिए सभी नगरवासी लोगो को जाना है। यह महाराजा की आज्ञा है।

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