पारणे के दिन के अलावा दिनों ऐसी आकस्मिक घटनाए क्यों नहीं हुई? ऐसा कैसा योगनुयोग ? मेरे निर्मित ही उन महात्मा का ऐसा प्राणान्त कष्ट आना था क्या ?मेरी तो विशुद्ध भावना थी पारणा करवाने की। कोई दम्भ या चाल नही थी मेरे मन मे। मेरा मन साफ था। सचमुच, उस महात्मा के प्रति मेरे दिल मे बहुमान भाव था और आज भी है। परंतु उस तपस्वी के दिल मे मेरे प्रति वैरभाव पैदा हो गया है, यह बहुत ही बुरा हुआ है। मेरे निमित्त कुलपति को भी वह आक्रोश भरे शब्द सुनाता है कुलपति का विनय-सत्कार नही करता है यह तो बड़ा ही अनर्थ हो गया। उसे मेरे आशय मे संदेह पैदा हो गया।’ यह राजा बचपन से ही मेरा दुश्मन है। बचपन से उसने मुझे घोर पीड़ा दी है। अब भी मुझे मार डालने के इरादे से जानबूझकर पारणा नही करवा रहा है। मेरे साथ घिनोना खेल खेल रहा है। मेरी कदर्थना करता है। मुझे जलील करता है। यह मेरा दुश्मन है। क्या करूं ?उस महत्मा को मै कैसे यकीन दिलाऊ कि मै, तुम्हारा दुश्मन नही हूं। मुझे तुम्हारे प्रति शत्रुता नही है। मेरे मन मे तुम्हारे लिए पूर्ण प्रेम है, श्रद्धा है। तुम्हारी उग्र तपश्चर्या के चरणों में नतमस्तक हुआ में तुम्हारा भक्त हूं। मेने तुम्हारी सेवा सच्चे अन्तःकरण से की है।
हा, बचपन और तरुणावस्था के दौरान तुम्हे मेने तरह तरह की यातनाये दी थी। तुम्हें खिलौना समझकर तुम्हारे साथ बहशीपन की हद तक के खेल किये थे।परंतु मेरे उन पापो का सच्चे दिल का पश्चाताप मेने तुम्हारे समक्ष किया था। आज भी वे मेरे पाप जब मेरी स्मृति में आते हैं तब अपने आप के प्रति मुझे तीव्र नफरत हो उठती हैं। परन्तु यह सब अब मै उन्हे समझाऊ तो भी कैसे ? उन्हें आश्रय देनेवाले, तापस धर्म देनेवाले, तपश्चर्या में सहायक बनने वाले कुलपति भी उन्हें समझा सके वैसी स्थिती नही रही, फिर मेरी तो उन्हें समझाने की कौनसी कोशिश कामयाब होगी ? और, उस महात्मा ने अब तो अनशन कर लिया है। मेरे प्रति वैरभाव से प्रेरित होकर उसने अनशन किया है।
सोमदेव के द्वारा दिये गये समाचार सही है। कुलपति केवल मेरे मन के समाधान के लिए ही कहते है कि ‘साधुपुरुष अंतिम समय में अनशन करके मृत्यु का वरण करते हैं, यह उनका अचार है, नही अग्निशर्मा ने किया हुआ अनशन, आचार पालन नही है अपितु मेरे प्रति उसके द्वेष की पैदाइश है।
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