महाराजा, उस महातपस्वी अग्निशर्मा ने अनशन अंगिकार किया है। वह अत्यंत गुस्से में है। अन्य तापसो के समक्ष वह निरन्तर आप ही के दोषानुवाद करता है।आपके प्रति उसके मन मैं तीव्र वैरभावना है।पुरोहित सोमदव ने जो मुख्य चार बाते जानी थी, वह महारजा गुणसेन के समक्ष कही। महाराजा इन बातों को सुनकर एकदम विक्षुब्ध हो उठे। ओह, उस महात्मा के दिल में मेरे लिए किसी भी तरह की वैरभावना न रहे, इसके लिए मैने कितने प्रयत्न किये ? सतत एक महीने तक तपोवन मे जाकर उस महत्मा की सेवा की, भक्ति की परन्तु फिर भी में उन्हें पारणा न करवा सका और उस महात्मा को मैने जानलेवा कष्ट दिया। सोमदव, मै तपोवन में जाकर, उस महत्मा के दर्शन कर के उनकी क्षमा मागूँगा। हालांकि में क्षमा के योग्य नही हूँ यह बात मैं भली भांति जनता हूँ परन्तु क्षमायाचना किये बगैर मेरा विवाद हल्का नही होगा।सोमदेव खामोश रहे। महाराजा ने उन्हें विदाई दी।दुःखी दिल से सोमदेव राजमहल से निकले। महाराजा ने अन्त:पुर में कहलाया कि महातपस्वी अग्निशर्मा के दर्शन करने के लिए सपरिवार तपोवन में जा रहे है महारानी वसन्तसेवा के अलावा तमाम परिवार को महाराजा के साथ पैदल चलकर तपोवन में जाना है। कलहसिकाओ से परीवृत्त राजहंस सा राजा,परिवार के साथ पैदल चलता हुआ तपोवन के द्वार पर पहुँचा। एक मुनिकुमार ने निर्मल भाव से जाकर अग्निशर्मा को राजा के आगमन के समाचार दिये। अरे, मुनिकुमार।तुम शीघ्र ही कुलपति को यहाँ बुला लाओ मुझे उस पाखंडी राजा का मुंह भी नही देखना है। मुनिकुमार अग्निशर्मा के आग से शब्द सुनकर घबरा उठे। वे दौड़ते हुए कुलपति के पास पहुंचे। घबराते घबराते उन्होंने कुलपति से कहा- पूज्यवर, आपको महातपस्वी अग्निशर्मा याद कर रहे है। कुलपति उनके सारे कार्य ज्यो के त्यों छोड़कर त्वरा से अग्निशर्मा के पास गये।कुलपति का पूजा सत्कार किये बगैर, विनय-विवेक को भूलकर अग्निशर्मा चिल्ला उठा- उस नराधम राजा का कला मुँह अब देखना पसन्द नही करूँगा। उसे जो भी कहना हो वह कहकर, रवाना करदो।
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