सतत द्वेष वैर औऱ गुस्से से उसकी गोल गोल आँखो में से जैसे कि आग के शोले टपक रहे है। उसके मोटे मोटे से होठ रह रहकर फड़फड़ा रहे थे। जैसे कि नफरत और गुस्से का लावा उफ़न उफ़न कर बाहर आ रहा है। इस नीच राजा को इतने सारे तापसौ में मै ही अकेला उपहास पात्र मिला ? मेरे लिये इस क्रूर दिल के राजा को इतने तीव्र द्वेष क्यों है?पारणे की मेरी कठिन प्रतिज्ञा यह जानता है, फिर भी यह धूर्त राजा, सब के सामने तो विनम्रता और भक्ति का स्वांग रचाता मुझे पारणे के लिए निमंत्रण देता है औऱ जान बूझकर पारना करवाता नही है मुझे जलील करता है। कितना मूढ़ है यह राजा। पहले बचपन में तरुणावस्था में तो में संसारी था, ठीक है उस समय उसने मेरी घोर कदर्थना की थी फिर भी मेने कर्मो का द्वेष मानकर उसके प्रति कभी द्वेष नही किया था। परन्तु अब तो मैं साधु हूं। तापस हूं। फिर भी क्यों यह मेरा पीछा नही छोड़ता है ? मुझे पीड़ा देता है। मुझे दुःखी करता है ? परन्तु इसमे इसका कोई पराक्रम नही है।
अनाथ, दुर्बल ओर पराभूत मनुष्यों को दुःखी करने में, उत्पीड़ित करने में या उन्हें मौत के घाट उतारने में कुछ भी बहादुरी नही है। इसमें भी जो महात्मा शत्रु-मित्र के प्रति समान भाव वाले है और परमार्थ की साधना में निरंतर लीन है वैसे तपस्वियों को कष्ट देने में इस राजा की क्या बड़ाइ है। यह तो उसकी कायरता है उसकी अधमता है। पर उसे उसके इस घोर पाप की शिक्षा में अच्छी तरह करूँगा। अब यह शैतान क्षमा के लायक भी नही रहा। सज्जनो की क्षमा, दुर्जनों की दुष्टता को प्रोत्साहन देती है। खैर मुझे इतनी पीड़ा क्यों हुई? अभी भी मेने आहार का संग छोड़ा नही है। महीने-महीने के अंतर से भी मेने आहार की इच्छा रखी है। इसलिए मुझे इतनी कदर्थना सहनी पड़ती है। ऐसा घोर तिरस्कार इस आहार की लालसा के कारण उठाना पड़ रहा है। इस लिये आज से में जीवनपर्यन्त आहार का त्याग कर देता हूँ। मै अनशन स्वीकार कर लेता हूँ।
अग्निशर्मा कब तपोवन में लौट आया औऱ कब अपनी जगह पर जाकर बैठ गया, यह जानकारी किसी भी तपोवन वासी को नही हो पाई थी। सभी तपस्वी अग्निशर्मा के पारणे के लिए अशस्वत थे। एक महीने से सतत राजा की भक्ति और सेवा देखकर किसी भी के मन मे तनिक भी संदेह नही रहा था। इस बार महातपस्वी पारणा करके, प्रसन्न चित्त से लौटेगें। यो मानकर सभी तपस्वी स्नान ईश्वर प्रणिधान, औऱ होम-हवन इत्यादि नित्य क्रम में जुड़े हुए थे।
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