कुलपति के निर्दभ वात्सल्य ने अग्निशर्मा के उपशांत भाव ने, और तपोवन के सभी तापसो के गुणानुराग ने राजा ने गुणसेन ने मनस्ताप को एवं अपराध भाव को साफ कर दिया था। राजा रानी के मन मे तपोवन के प्रति लगाव सा पैदा हो गया था। अग्निशर्मा को कुशलप्रच्छा कर के प्रतिदिन राजा उसे माल्यापर्ण करते थे।उनके शरीर पर सेवको के द्वारा चंदन का विलेपन करवाते थे। रोजाना पारणे के दिन गिनते थे।जब पारणे को एक सप्ताह बाकी रहा तब राजा ने अपने मन मे संजोए हुए मनोरथो से रानी वसन्तसेना को परिचित करवाया। देवी, हम उस महान तपस्वी के पारणे का उत्सव भव्यता से एवं धूमधाम से मनायेगे। मैंने आज ही मंत्री को आदेश दिया है कि तपोवन से नगर की और आनेवाला पुरा रास्ता सुंदर ध्वज पताका वगैरह से सजाया जाए। कलात्मक तोरण व कमाने लगाई जाये। रास्ते पर सुगन्धित पानी छीटा जाये। यह सब पारणे के दिन के पूर्व हों जाएगा। पानी का छिड़कना तो रोजाना चालू रहेगा। देवी, पारणे के दिन राज्य के कारागृह के द्वार खोल दिए जाएंगे। मैं तमाम कैदीयो को मुक्त कर दूँगा। तपोवन के सभी तपस्वियों का, अग्निशर्मा के पारणे के पश्चात उचित स्वागत करूंगा। देवी, तुम तो नही आ सकोगी… पर मैं परिवार के साथ उस तपस्वी को लेने के लिए पैदल चलकर तपोवन जाऊँगा। राजमहल के द्वार पर सच्चे मोतियों से उनका स्वागत करूंगा। उस दिन महल को स्वर्ग के विमान जैसा सजाया जाएंगे । फिर हम सुगंधित जल से उस तपस्वी के चरण धोएंगे। उन्हें काष्ठासन पर बिठाकर, उत्तम द्रव्य परोसकर उन्हें पारणा करवाएंगे। पारणे के पश्चात तपस्वी के प्रयोग्य कीमती गेरुए वस्त्र उन्हें अर्पण करेगें। उनके गले मे गुलाब ओर मोगरे के फूलों की माला आरोपित करेंगे। शीतल चंदन से उनके ललाट पर एवं हाथ पर विलेपन करेगे। उनके शुभ आशीर्वाद लेकर उन्हें तपोवन तक वापस छोड़ने के लिए जायेंगे।
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