लीलावती के पीछे फानहान सुरसुन्दरी को लेकर चला।सुरसुन्दरी परेशांन थी इस अनजान प्रदेश में मेरे लिए सवा लाख रुपये देने वाली यह औरत कौन है। हवेली आ गई। लीलावती ने सवा लाख रुपये गिन कर दे दिये। फानहान रुपयो को लेकर सुरसुन्दरी की और कटिलतापूर्ण हस कर चल दिया।
लीलावती सुरसुन्दरी को लेकर अपने भव्य रतिक्रिया भवन में आयी।
क्या नाम है तेरा रूपसी?
सुरसुन्दरी
बड़ा प्यारा नाम है ।पर मै तो तुझे सुंदरी ही कहूँगी ।
चलेगा…।
तु स्नान वगैरह करके यह सुन्दर वस्त्र पहनले ।फिर अपन शान्ति से बात करेंगे।
सुरसुन्दरी ने स्नान करके लीलावती के दिये कपडे पहन लिये। वह लीलावती के पास जाकर बेठ गई। लीलावती सुरसुन्दरी का सरसो के फूलो सा खिला खिला रूप देखकर मुग्ध हो उठी ।उसका मन बोल उठा:
‘सवा लाख रुपया तो 10 दिन में रूपसी कमा देगी।’ उसने सुरसुन्दरी कहा:
सुन्दरी अब तेरे तन मन के दुःख मिट गये समझना।तेरे मन में जो चिंताए हो जो भी परेशानिया हो सब कुछ बाहर फेक देना एक धम ख़ुशी में आजा ।इस हवेली में तुझे रहना है ।तुझे पसनद हो वो खाना तुझे पसंद हो वह श्रंगार करना ।इस हवेली के उधान में सरोवर है। उसमे मनचाही जल क्रीड़ा करना ।शरीर पर सुघंधित द्रव्यों का विलेपन करने का ।आँखो में अनजन लगाना।
पर यह सब क्यों करने का? ।मेरे पर तुम इतना ढेर सारा प्यार क्यों उलेट रही हो।मेरी समझ में नहीं आ रहा है कुछ।
समझ में आ जायेगा सुन्दरी , बहुत जल्द मालूम हो जायेगा तुझे भी सब कुछ। यह सब करके तुझे इस हवेली में आने वाले रसज्ञ पैसे वालो को शय्यासुख देना है। उन्हें खुश कर हजारो रुपये पाना है। हा तुझे जो पसन्द हो.. उस आदमी को तु खुश करना। तुझे जो नापसन्द हो उसे में अन्य किसी लड़की के पास भेज दूँगी।
आगे अगली पोस्ट मे…