मैं प्रतिदिन उन्हें जो समय अनुकूल रहता… उस समय ही उनकी अनुज्ञा प्राप्त कर के जाता था । ज्यों ज्यों उन महात्माओं का परिचय बढ़ता गया त्यों त्यों मेरा प्रेम बढ़ता चला। उन के प्रति मेरी आस्थापूर्ण श्रद्धा सुद्रढ़ होती चली । मैंने महसूस किया कि जैसे मेरे बहुत सारे पाप धुल रहे हों ।
वे सभी उपशान्त आत्माएं थी । कषायों पर जैसे कि उन्होंने विजय पा लिया था । क्रोध – लाभ – मद – मान – हर्ष – उद्वेग…वगैरह कोई भी दुर्भाव या किसी प्रकार का दुराव मैंने कभी उनके व्यक्तित्व में पाया ही नहीं। एक दिन मैंने उनसे पूछा : ‘प्रभो, आप रात्रि कैसे व्यतीत करते हैं ?’
उन्होंने कहा था कि : ‘कभी गुफा में , कभी गुफा के द्वार पर , कभी अन्य किसी निकटस्थ पर्वतीय इलाके में कायोत्सर्ग ध्यान में खड़े रहते हैं । कभी जिनोवत तत्वों की अनुप्रेक्षा करते रहते हैं । कभी अध्ययन किये हुए शास्त्रों का स्वाध्याय करते हैं ।’
महीने – महीने के उपवास करने पर भी उन महात्माओं को कभी मैंने न तो थके हुए देखा, नहीं परेशान देखा । किसी भी अस्त्र-शास्त्र के बगैर पर्वतीय प्रदेश में रहते हुए भी मैंने उनमें किसी प्रकार का डर नहीं पाया । न कभी उन्होंने मेरी उपेक्षा की — या न कभी मुझ से कुछ अपेक्षा रखी । उनकी निसपृर्हता और अकिंचनता से मैं पूरी तरह प्रभावित हुआ जा रहा था ।
एक समय जब धरती पर जोरशोर से बारिश हो रही थी , हम गुफा में बैठे हुए थे । उनकी धीर समीर सी गंभीर वाणी गूंज रही थी : ‘विजयसेन, इस दुनिया में दुःख का मूल कारण परद्रव्यों की , पर पदार्थों को, पर व्यक्त्तियों की आशा और अपेक्षा है । तृष्णा और कामना है । ज्यों ज्यों आशा और अपेक्षा सन्तुष्ट होती है… त्यों त्यों अग्नि में डाले जानेवाले कष्ट के कारण अग्नि और ज्यादा प्रज्वलित होता है… वैसे तृष्णा और कामना बढ़ती चलती है । इसकी न तो सिमा है, न कहीं अंत है ।
इसलिए सुखी होने का सही रास्ता है : उन आशाओं से , अपेक्षाओं से, तृष्णा और कामनाओं से मुक्त्त हो जाना । हम स्वजन, परिजन और वैभव की आशा से मुक्त्त हो गये हैं । उन सब की कोई अपेक्षा नहीं रही है । अब हम इस शरीर से संबंधित अपेक्षाओसे मुक्त्त होने के लिए प्रयत्नशील है ।’
उनकी मेरे पर कुपा बरस रही थी ।
‘कुमार, मन को चंचल करनेवाली, अस्थिर करने वाली, विह्मल बनानेवाली ये आशा और अपेक्षा ही हैं । ज्यों ज्यों ये घटती गई…. त्यों त्यों हम मन की स्थिरता और स्वस्थता प्राप्त करते गये । मन ज्ञान और ध्यान में रमने लगा । उसी में तृप्ति का अनुभव करते गये ।’
मैं कभी कभी उन्हें पूछ बैठता था : ‘क्या आपको कभी भी वैषयिक वासनाएं, दैहिक आवेग परेशान नहीं करते ?’ वे कुछ स्मित के साथ कहते : ‘वत्स, वासना को उठने का अवसर मिले … या निमित्त मिले तब वह जगेगी ना ? आठ प्रहर की दिनरात की हमारी दिनचर्या ही इस तरह की है कि वे बेचारी वासनाएं मूत: प्रायः बन चुकी हैं । और तपश्चर्या उन वासनाओं को दूर हटाने का अमोघ उपाय है ।
और फिर , ज्ञान – ध्यान में परम तृप्ति का अनुभव करनेवाला मन वासनाओं की गंदगी में खेलना पसंद करता ही नहीं है । कुमार, अब तो आत्मध्यान में जिस परमानन्द की अनुभूति होती है… उसी में तृप्ति मिलती है ।’
आचार्य विजयसेन ने राजा गुणसेन से कहा :
‘मुनिवरों का सहवास-सांनिध्य मेरे लिए परम् तृप्ति का कारण बन गया । ‘
राजा गुणसेन ने पूछा : ‘भगवंत, उन महात्माओं की ऐसी अमृतमय वाणी सुनकर आप को केसा आत्मसंवेदन होता था ?’
‘राजन, वह शब्दों में व्यक्त्त हो नहीं सकता । उसकी अभिव्यक्त्ति के लिए पर्याप्त शब्द नहीं है ।’
‘सही बात है आपकी । प्रभो, आज मैं खुद भी वैसा ही कोई संवेदन अनुभव कर रहा हूं। जिसे कहने के लिए शब्द नहीं है मेरे पास ।’
‘राजन, मेरे उत्कृष्ट आत्मसंवेदन की घड़ियाँ तो तब आई…. कि जब चातुर्मास के चार महीने पुरे हो चुके थे।’
‘ऐसा क्या हुआ, भगवंत ?’ महाराजा गुणसेन की उत्सुकता बढ़ गई और वे पूछ बैठे ।