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आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 8

‘कुमार , इस पश्चिम महाविदेह क्षेत्र में इन दिनों तीर्थंकर भगवंत साक्षात् विचरण करते जरुर हैं , पर बहुत दूर – सूदूर के प्रदेशों में उनका विचरण है। हमने उनके दर्शन किये हुए हैं ।’
‘क्या प्रभो ? आपने उनके दर्शन किये हुए हैं ? आपने अपनी आंखों से देखा है परमात्मा को ?’
‘हां, कुमार! हमने समवसरण में बैठकर धमदेशना सुनी है। दिनों तक , महीनों तक उनके श्री चरणों के सन्निधान में रहे हुए हैं ।’
‘सचमुच, आप तो महान पुण्यशाली हैं… श्रेष्ठ भाग्य है आपका। आपका तो मनुष्य जीवन सफल हो गया ।’ मैं भावविभोर हुआ जा रहा था ।
आचार्य विजयसेन भावपूर्ण प्रवाह में बोल रहे थे । राजा गुणसेन और राजपरिवार मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था । राजा गुणसेन ने कहा :
‘भगवंत, आप स्वयं भी कितने भाग्यशाली हो ? कैसे महान व उत्तम सद्गुरुओं का परिचय – सत्संग मिल गया उस गुफा में। परमात्म तत्व की कितनी सुंदर और अदभुत बातें सुनने को मिली ।’
‘राजन, चार महीने में तो उन मुनिओं ने मुझे सर्वज्ञशासन की ढेर सारी बातें सिखाई…. समझायी । मैंने जो जो जिज्ञासा व्यक्त्त की , मुझे सन्तुष्टि हो उस ढंग से उन्होंने मुझे प्रत्युत्तर दिये । मेरी हर एक जिज्ञासा को संतोष दिया ।
— विस्तार से विस्तार से ‘आत्मा’ की जानकारी दी ।
— आत्मा का स्वाभाविक एवं वैभविक स्वरुप समझाया ।
— जड़ पुदगलों का व्यापक स्वरुप समझाया ।
— पुन्यतत्व और पापतत्वों की विशाल दुनिया दिखाई ।
— कर्म – विज्ञान की अटल गहराइयों में मेरा प्रवेश करवाया ।
— संसार की चार गतियाँ, उनमें अनन्त जीवों का परिभ्र्मन , सुख – दुःख के अनुभव , जन्म और मुत्यु की वेदनाएं … प्रत्येक जन्म में बदलते रिश्ते , बदलते संबंध…उसमे बनती – बिगड़ती विषमताएं , यह सब मुझे दिनों तक बड़ी बारीकी से समझाया था ।
— आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त्त करने के उपाय बतलाये ।
— मोक्ष का…मुक्त्ति का स्वरुप समझाया ।
— यह सब समझाने के लिए उन्होंने सच्ची कहानियां कही । काल्पनिक
उपनय–प्रतीकात्मक कथाएं सुनाई ।
–महापुरुषों की जीवन कथाएं ऐसी सुनाई कि सुनते सुनते हर्ष की… विषाद की… भय की… और आश्चर्य की विविध भावनाओं संवेदनाओं का ज्वार उतने लगता ।
राजन, चार महीने का दीर्घ समय जैसे पलक झपकते बीत गया…। उन चारों तपस्वी मुनिवरों की सेवा करने का, उनकी पर्युपासना करने का भी मुझे उत्तम लाभ प्राप्त हुआ ।
तुम्हें आश्चर्य होगा राजन, कि उस गुफा में मेरे आलावा उस नगर का कोई भी आदमी चार महीने में कभी भी आया नहीं…। और इस कारण उन चार मुनिवरों की आराधना में तनिक भी विक्षेप नहीं हुआ ।

आगे अगली पोस्ट मे…

आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 7
June 23, 2018
आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 9
June 23, 2018

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