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आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 7

‘राग नहीं, द्वेष नहीं… वीतराग होते हैं ….। त्रिकालज्ञानी होते हैं । लोकालोक के तमाम द्रव्यों के, सर्व पर्यायों के ज्ञाता एवं द्रष्टा होते हैं ।
वे धर्मतीर्थ की स्थापना करनेवाले होने से उन्हें ‘तीर्थंकर’ भी कहा जाता है । तीर्थंकरों के बारह विशिष्ट गुण होते हैं।
वे जिस समवसरण में बैठकर धर्म का उपदेश देते हैं…उस समवसरण की रचना देवों के द्वारा की हुई होती है ।
सोना-चांदी-और रत्नों के तीन किल्लेनुमा प्रकार की रचना करके उस पर मणिमुक्ता से खचित नयनरम्य सिंहासन रखते हैं। उस पर बैठकर तीर्थंकर भगवान धर्मदेशना देते हैं।
समवसरण पर अशोकवुक्ष की शीतल छाया रहती है।
तीर्थंकर के सिर पर तीन छ्त्र होते हैं ।
तीर्थंकर के सिर के पीछे भामंडल होता है ।
दोनों ओर देव चामर दुलोटे हैं ।
आकाश में देव – गण दुंदुभि बजाते हैं…। दिव्य ध्वनि करते हैं…और फूलों की वुष्टि करते हैं ।
— लोकालोक प्रकाशक उनका ज्ञान होता है ।
— सभी जीव अपनी भाषा में समझ सके वैसी उनकी वाणी होती है ।
— देव, देवेन्द्र और सम्राट उनके चरणों की पूजा करते हैं ।
— जहां जहां उनका विचरण होता है, वहां रोग या उपद्रव नहीं होते हैं ।
वैसे अरिहंत भगवंत होते हैं ।’
मैंने उन मुनिराज से पूछा : ‘वे वीतराग होने पर भी क्या दूसरे जीवों को सुखी बना सकते हैं ?’
उन्होंने कहा : ‘हाँ, वे स्वयं परम सुखी होते हैं । उनकी शरण में गये हुए जीवों को परम सुखी करते हैं। वे स्वयं बुद्ध होते हैं , उनके चरणों में गये हुए भव्यों को वे बुद्ध बनाते हैं। वे भवसागर को तैर चुके होते हैं , उनकी शरण में गये हुए जीवों को भवसागर से पार लगाते हैं ।
‘भगवंत, क्या अरिहंत परमात्मा संसार के जीवों की रक्षा करते हैं ?’
मुनिवर ने कहा : ‘हां , अवश्य । वे रक्षा करते हैं । जिस तरह ग्वाला उसके पशुओं की रक्षा करता है … जैसे सार्थवाह अपने काफिले की रक्षा करता है… और जिस तरह जहाज का कप्तान जहाज में बैठे हुए यात्रियों की रक्षा करता है, त्यों परमात्मा अरिहंत , उनकी शरण में गये हुए जीवों की रक्षा करते हैं ।’
मैंने उन मुनिवर से कहा : ‘ऐसे परम करुणावन्त परमात्मा के प्रति तो सहजरुप से श्रद्धा पैदा हो सकती है ।’
‘अरे, कुमार । तू यदि तेरी आँखों से उन अरिहंत परमात्मा को यदि देखे तो घर… बार… और स्नेही स्वजन सभी को भुलाकर उनका अनन्य प्रेमी बन जाए। अदभुत और अद्वितीय उनका रुप और लावण्य होता है। घंटो बीत जाए उन्हें एकटक देखते हुए। फिर भी आँखें थकती नहीं कि दिल भरता नहीं। घंटो तक उनके सामने खड़े भी रहें तो भी थकान महसूस होने का नाम नहीं । उनके पावनकारी सानिध्य में न तो भूख लगती है…न ही प्यासी लगती है…न तो खेद या उद्वेग महसूस होता है…और नहीं कोई पीड़ा ।’
‘मुनिवर, ऐसे परमात्मा से साक्षात् दर्शन कहां हो सकते हैं ? कैसे हो सकते हैं ?’

आगे अगली पोस्ट मे….

आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 6
June 23, 2018
आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 8
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