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आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 5

‘मुनिवर , आप सब कुशल तो है ना ?’ मैंने कुशलपुच्छा की ।
‘परमात्मा की और सद्गुरु की कृपा से हम कुशल हैं।’ ज्येष्ठ मुनिवर ने प्रत्युत्तर दिया ।
‘वर्षाकाल में क्या आप यहीं स्थिरता करेंगे ?’ दो – चार दिन में ही बारिश शुरु होनेबक चिहन नजर आ रहे थे, इसलिए मैंने यह प्रश्न पूछा ।
‘हां महानुभाव, वर्षाकाल हम इसी शांत-एकान्त स्थान में गुजारने की इच्छा रखते हैं ।’
‘परंतु भगवंत, नगर से दूर होने के कारण , भिक्षा के लिए वर्षाकाल में आपको तकलीफ तो नहीं होगी ?’
‘कुमार, हम चारों मुनि, महीने-महीने के उपवास करने की इच्छा रखते हैं । इसलिए महीने में एक बार ही भिक्षा के लिए नगर में जाने का होगा ।’
‘ओह। धन्य है आपको। महीने-महीने के उपवास कर के ,ज्ञान – ध्यान में निमग्न रहकर , आप वर्षाकाल यहां पर बितायेंगे ? सचमुच। आप महान है ।’
‘कुमार , आत्मा को निर्मल बनाने के लिए , कर्म – बंधन से आत्मा को मुक्त्त करने के लिए, ये दो ही अमोघ उपाय है : ज्ञान और तप ।’
मैं भावविभोर हो उठा । मैंने पूछा :
‘भगवंत, क्या मैं प्रतिदिन यहां आपके पास आ सकता हूं ? मेरे आने से आपके ज्ञानध्यान में या साधुजीवन के आचारपालन में विक्षेप तो नहीं होगा ना ?’
मेरे सवाल से चारों मुनिओं के चेहरे पर चांदी जैसा स्मित उभर आया। ज्येष्ठ मुनिवर ने बड़े वात्सल्य से मुझे कहा :
‘महानुभाव, हमें जिस तरह आत्मकल्याण करना है… वैसे अन्य सुयोग्य आत्माओं पर भी उपकार करना होता है। जिनेश्वर भगवंतों की आज्ञा है कि ‘सुयोग्य जीवों को धर्मोपदेश देने में थकना नहीं । परेशान नहीं होना। इसलिए वत्स, तू प्रतिदिन यहां पर खुशी से आ सकता है। हम तुझे सर्वज्ञ शासन के तत्वों का बोध देंगे ।’
‘ओह, आप कितने करुणावन्त हैं। मुझ से अबोध , अज्ञानी , पामर मनुष्य पर अपने अपार करुणा की । आपके पास प्रतिदिन आने से, आपके दर्शन करने से , आप से ज्ञान – बोध प्राप्त करने से… मेरा संतप्त आत्मा को अपूर्व शांति मिलेगा ।’
‘कुमार , आधि – व्याधि और उपाधि से भरे हुए इस संसार में जीव को एकमात्र जिनवचन का ही सच्चा सहारा है जिनेश्वर के तापसन्तापहारी वचनों से ही शांति प्राप्त हो सकती है ।’
मैंने सोचा : ‘ये मुनिराज आज ही विहार कर के आये हुए हैं । श्रमित हुए हैं , और फिर भिक्षा का समय भी हो चूका है….। मुझे अब यहां से चलना चाहिए ।’ मैंने मुनिवरों को भिक्षा के लिए निमंत्रण दिया , पुनः उनके चरणों में वंदना की और गुफा में से बाहर निकला । तलहटी में आकर अश्वारूढ़ होकर नगर में वापस लौटा।

आगे अगली पोस्ट मे…

आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 4
June 23, 2018
आचार्य श्री की आत्मकथा – भाग 6
June 23, 2018

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