मेरे स्वजन जानते थे कि हम दोनों मित्रों को साधुपुरुषों के पास जाना… उनका परिचय करना… उनकी सेवा करना अच्छा लगता था ।
एक दिन मेरे कमरे में मैं निराश- गुमसुम सा बैठा था। इतने में महामंत्री ने आ कर मुझ से कहा : ‘कुमार, तुम्हें अच्छे लगे वैसे एक समाचार देने के लिए आया हूं।’
मैंने खड़े होकर महामंत्री का स्वागत किया। वे मेरे सामने के भद्रासन पर बैठे और मुझ से कहा :
‘कुमार, गाँव-नगर में विचरण करते हुए चार मुनिवर , नगर से थोड़ी दूरी पर जो पर्वत है… उस पर्वत की गुफा में पधारे हुए हैं। और वे वहां वर्षाकाल में स्थिरता करनेवाले हैं। मुनिवर शांत-प्रशांत और तपस्वी प्रतीत होते हैं ।’
महांमत्री की बात सुनकर मेरा मन आनंदित हो उठा। मित्र की मौत के बाद पहली बार विरहाग्नि से जलते – झुलसते मेरे ह्रदय पर जैसे कि शीतल जल का छिड़काव हुआ ।
‘महामंत्रीजी, मैं अविलम्ब उन मुनिवरों के दर्शन करने जाऊंगा ।’
महामंत्री चले गये ।
मैंने कपड़े बदले। नौकर से कहकर मेरा घोडा तैयार करवाया । अश्वारूढ़ होकर मैं पर्वत की ओर चला । परंतु मेरे मन में तो मेरे स्वर्गस्थ मित्र के विचार ही उमड़ रहे थे। वह यदि जिन्दा होता तो आज हम दोनों साथ साथ मुनिवर के दर्शन करने के लिए जाते। हमारे अश्व साथ साथ चल रहे होते ।’
सोच ही सोच में न जाने कब पर्वत की तलहटी आ गई….। पता भी नहीं लगा। अश्व खड़ा रह गया। मैं नीचे उतरा। अश्व को वहीं खुला छोड़कर गुफा की ओर जा रही पर्वतीय पगडंडी पर चलने लगा ।
यह गुफा मेरी जानी पहचानी थी। इस गुफा में अक्सर योगी… मुनि और तापस लोग ही आते थे । रुकते थे। और साधना कर के अपनी राह चल देते थे । मैं ओर विभावसु उन सब के पास जाते रहते थे ।
मैं गुफा के द्वार पर पहुंचा ।
मैंने चार तेजस्वी मुनियों के दर्शन किये। दो मुनिवर ध्यान में लीन थे। दो मुनिवर स्वाध्याय में मग्न थे। उनके चेहरे पर सौम्यता थी। मेरे दिल में प्रसन्नता छाने लगी। मैंने गुफा में प्रवेश कर के उन चरों मुनिवरों को वंदना की। उन्होंने मुझे धर्मलाभ का आशीर्वाद दिया । मेरे लिए ‘धर्मलाभ’ शब्द नया था। चूंकि जिनेश्वर – शासन, जिनधर्म के मुनिवरों के दर्शन मैं पहली बार कर रहा था ।
आगे अगली पोस्ट मे…