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क्षितिप्रतिष्टित नगर में – भाग 4

बचपन मे मैं जानबूझकर उसे दुःख दिया। उसका उत्पीड़न किया।और अभी जबकि यौवन उतरावस्था है तब, उस महात्मा को सुख ही देने की इच्छा होने पर भी, सुख नही दे सका। उनके दुःख में ही निमित्त बना। मुझे क्या मालूम था कि वह ब्राम्हणपुत्र अग्निशर्मा, क्षितिप्रतिष्ठित नगर से भागकर इस तपोवन में आकर तापस बन गया है। यहाँ इस नगर…

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क्षितिप्रतिष्टित नगर में – भाग 3

राजन, अभी तो वह महात्मा ध्यान में लीन है। इसलिए तुम इस वक़्त तो उसके दर्शन नहीं कर सकते। उसके ध्यान में क्यों खलल करना ? इसलिए इस समय तो तुम नगर में लौट जाओ, और किसी दिन आकर दर्शन कर लेना। राजा ने मुरझाए चेहरे से कातर स्वर में कहा। जैसी आपकी आज्ञा, में फिर कभी आऊँगा। राजा खड़ा…

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क्षितिप्रतिष्टित नगर में – भाग 2

अग्निशर्मा के कठोर वचन सुनकर कुलपति का दिल आहत हो उठा।यह तपस्वी जरूर उग्र कषायों से घिर गया लगता हैं।इसका चित्त कषायों के कीचड़ से कलुषित हो उठा हैं।इस समय राजा गुणसेन को इसके पास दर्शनार्थ नही आने देना चाहिए। उसे वही से विदाई देना-यही उचित है। यदि यह तपस्वी राजा को देखेगा तो ज्वालामुखी की भांति फट पड़ेगा। होश…

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क्षितिप्रतिष्टित नगर में – भाग 1

महाराजा, उस महातपस्वी अग्निशर्मा ने अनशन अंगिकार किया है। वह अत्यंत गुस्से में है। अन्य तापसो के समक्ष वह निरन्तर आप ही के दोषानुवाद करता है।आपके प्रति उसके मन मैं तीव्र वैरभावना है।पुरोहित सोमदव ने जो मुख्य चार बाते जानी थी, वह महारजा गुणसेन के समक्ष कही। महाराजा इन बातों को सुनकर एकदम विक्षुब्ध हो उठे। ओह, उस महात्मा के…

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