मानव का मूलभूत स्वभाव दुखी रहने का है । मानव को दुःख के लिए रोने मे भी सुखी होने से ज्यादा मजा आता है । थोडे दिनो तक लगातार काम करले मानव तो उसको लगता है छुट्टी हो जाए तो ज्यादा अच्छा क्योंकि ज्यादा काम करने के कारण भी वो दुःखी हो जाता है। और जब उसको holiday मिलता है तो वह बोर हो जाता है। और कहता है कि इससे अच्छा तो काम करता तो अच्छा होता। मतलब सिधा और सही है कि हमे खुश रहना ही नही है। दुःख हो या ना हो हमे तो उसे ढूंढकर निकालना है । और फिर सिर पर हाथ देकर के बैठने मे मजा आता है । सही मे यह वस्तु तो मानव के हाथ मे है। उसे दोनो हो तो उसे किसकी अनुभूति करनी है । जब ज्यादा से ज्यादा दुःख होता है सुख भी उसके साथ ही होता है। बस इन्सान को दुःख मे से सुख शोधकर उसकी अनुभूति करनी चाहिय। परंतु मानव उसके स्वभाव के कारण सुख के सागर मे से दुःख की बूंदो को निकाल कर के रोता रहता है।
एक कथा मुझे याद आ गई है- एक बड़े मंदिर मे रोज रोज सत्संग भराता रहाता था। दुर दुर से महिलाए आती थी। उसमे एक महिला बहुत दुखी नजर आ रही थी। स्वामी जी ने उससे पूछा कि बहन क्या बात है? आप बहुत उदास दिख रही हो। कुछ समस्या है? या कुछ परेशानी है? उस महिला ने जवाब दिया कि मै मेरे पति से दुःखी हू। क्यों? वो कई गलत रास्ते पर चढ गए है क्या? नही ! बस वो मंदिर नही जाते, किसी के साथ सत्संग नही बैठते, इसलिए मे दुःखी हू। वह रोज मुझे मंदिर छोडने – लेने आते है और मै कहती भी हू की चलो भगवान के दर्शन कर लो, तो कहते है कि मुझे इसमे रस नही। मै यही पर खडा हूँ। बस इसी कारण मै दुखी हूँ। कोई बात नही बहन! उनकी इच्छा नही होती होगी तो नही आते होंगे, इसमे दुःखी नही होना।
दुःखी होने की ही तो बात है क्योंकि उनके कारण तो मेरा जीवन बिगड़ गया है और मुझसे भगवान रूठ गए तो?
स्त्री बात करते करते रोने लगी तो उस समय स्वामी जी ने समझाया कि बहन सच कहू
स्त्री बात करते करते रोने लगी तो उस समय स्वामी जी ने समझाया कि बहन सच कहू तो इसमे रोने की बात भी नही है और दुखी होने की भी बात नही है। बस इसमे आप आपकी सोचने की द्रष्टि बदल दो। आप मात्र positive सोचने लगो। कोई बात नही पति मंदिर नही आते है तो मुझे तो नही रोकते। मुझे लेने – छोडने आते है मेरे लिए खड़े रहते है और यह सब करते है। वो मेरे लिए धूप छाव गर्मी सर्दी सहन करते है । उनकी इच्छा नही होने के बाद भी मेरे लिए करते है । यही है दुःख मे से सुख शोधने की कला। इसी तरह आप अगर हर बात मे से positive लोगे तो दुःख मे से भी सुख उछालकर आ जाएगा और हम हर समय सुख पूर्वक रह सकते है ।
दुःख को दुर करने की चाबीया :-
- दुःखो से डर कर भागो नही, उनसे सामना करो
- याद रखना समय से पहले और वक्त से ज्यादा कभी किसी को कुछ नही मिलता है
- किसी के साथ भी हद से ज्यादा संबंध मत रखो
- दुसरो कोे कैसा लगेगा यह विचार कर जीना छोड दो
- दुसरे हमारी बात नही मानते यह आग्रह त्याग दो
- जल्दी सुख संपति मिलने के लिए दुसरे रास्ते मत अपनाओ
- सुखो की आशा मे सिर पर हाथ देकर मत बैठे रहो
क्योंकि याद रखना –
” कमजोर और दुर्गुणी मानव ही दुःख का वांक निकालते है” ।।स्त्री बात करते करते रोने लगी तो उस समय स्वामी जी ने समझाया कि बहन सच कहू तो इसमे रोने की बात भी नही है और दुखी होने की भी बात नही है। बस इसमे आप आपकी सोचने की द्रष्टि बदल दो। आप मात्र positive सोचने लगो। कोई बात नही पति मंदिर नही आते है तो मुझे तो नही रोकते। मुझे लेने – छोडने आते है मेरे लिए खड़े रहते है और यह सब करते है। वो मेरे लिए धूप छाव गर्मी सर्दी सहन करते है । उनकी इच्छा नही होने के बाद भी मेरे लिए करते है । यही है दुःख मे से सुख शोधने की कला। इसी तरह आप अगर हर बात मे से positive लोगे तो दुःख मे से भी सुख उछालकर आ जाएगा और हम हर समय सुख पूर्वक रह सकते है ।