सोमदेव खड़े हुए। अग्निशर्मा को प्रणाम किया औऱ वे नदी के किनारे पर टहलने लगे। कुछ दूरी पर पहुँच कर उन्होंने एक युवान तापस को नदी में स्नान के लिये जाते देखा। उसके हाथ मैं दर्भ का घास और फूल थे। गेरुआ अधोवस्त्र उसने पहन रखा था। बदन खुला था। सर पर काले बालो की जटा बंधी हुई थी। चेहरे पर सौम्यता थी। सोमदेव त्वरा से कदम बढ़ाते हुए उस तापस के समीप पहुंचे तापस को प्रणाम करके पुछा: महात्मन, एक बात जरा पूछनी है यदि आप इज़ाज़त दे तो! तापस ने मोन सहमति दी और वह खड़ा रहा। महात्मन महातपस्वी अग्निशर्मा ने कैसा व्रत अंगीकार किया है ? आजीवन अन्न जल के त्यागरूप अनशन। पर क्यों ? महानुभव कारण क्या बताऊँ ? बड़ा अनर्थ हो गया है। उस तपस्वी के दिल मे महाराजा गुणसेन के प्रति घोर द्वेष पैदा हो गया है। दिनभर वह तपस्वी महाराजा की बुराई करता रहता है। वह अपनी तपस्या को क्रोध और नफरत की आग में झोंक रहा है। वह परलोक को भूल गया है। उसने परमार्थ को बिसार दिया है। युवान तापस की आँखों में आंसू भर आये। तीन-तीन बार वह तपस्वी, महाराजा के निमंत्रण पर उनके राजमहल पर पारणा करने के लियेे गया। उसी दिन महाराजा के इर्दगिर्द महल मे शुभ-अशुभ घटनाएं संजोगवश बनती रही। महाराजा एक या दूसरे कारण से उसे पारणा नही करा सके। हम सभी तापस महाराजा गुणसेन की साधुजन-वत्सलता जानते है। पिछले एक महीने से प्रतिदिन महाराजा स्वयं तपोवन मे आकर सभी छोटे-बड़े तापसो की कैसी सेवा-भक्ति करते है यह सबको विदित है। ऐसे गुणनिधान राजा, जानबूझकर अग्निशर्मा को पारणा न करवाये, यह सोचा भी नहीं जा सकता। परन्तु अग्निशर्मा तो बोलता है यह राजा मेरा शत्रु हैं। वह जानबूझकर मेरा पारणा चुका रहा है और मुझे मार डालना यही उसका इरादा है महानुभाव, तुम किसी से कहना मत, परन्तु इस ज्वालामुखी जैसे तपस्वी ने संकल्प किया है कि मेरी तपश्चर्या का यदि कोई फल मिलनेवाला हो तो जनम-जनम इस दुष्ट राजा को मारने वाला बनूं गुस्से के आवेश में एक बार वह हम तापसो के समक्ष इस तरह बोल गया था। अरे, यह तो महाराजा के ऐसे ऐसे अवगुण बोलता है कि हम तो सुन ही नही सकते। सुनते सुनते सोमदेव की आँखो में आंसू उभर आये। उन्होंने सदभावभरे युवान तपस्वी के चरणों में वंदना की। तापस नदी के पट मे उतर गया।सोमदेव तपोवन से बाहर आये। घोड़े पर चढ़कर राजमहल पहुंचे। महाराजा गुणसेन सोमदेव की प्रतिक्षा मे बेचैन हुए जा रहे थे।