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अग्निशर्मा का अनशन – भाग 8

राजा और राजपरिवार, राजकुमार के जन्म महोत्सव में लीन थे। सर्वत्र आंनद उल्लास और उमंग उछल रहा था। इतने में परिचारिका ने आकर राजा को प्रणाम कर के निवेदन किया, महाराजा दुग्धपान का समय हो गया है। दुग्धपान? राजा परिचारिका के सामने फ़टी फ़टी आँखों से देखता रहा।औऱ सहसा खड़ा होकर बोल उठा अरे रे आज तो उस महातपस्वी का पारणा है उन्हें पारणा करवाने के पश्चात ही में दुग्धपान करूँगा देखो जरा, राजमहल के द्वार पर वे महात्मा आकर खड़े होंगे। अरे में ख़ुद ही जाकर उनका स्वागत करता हूं। राजा गुणसेन दौड़ते हुए महल के द्वार पर पहुंचे। वहाँ पर खड़े द्वार-रक्षको से पूछा यहाँ एक दुबले-पतले कृशकाय तपस्वी महात्मा आये थे क्या? द्वार रक्षको को पता नही था। वे इर्दगिर्द देखने लगे। कुछ दूर खड़े नगरवासी युवको से जाकर पुछा तो एक युवक ने कहा हाँ, सूर्योदय के बाद एक घटिका में एक तपस्वी महात्मा आये थे। परन्तु किसी ने उनको न तो उनको बुलाया न उनका स्वागत किया इसलिए वे तुरंत वापस लौट गये। राजा का दिल दहल उठा। चेहरे पर उदासी छा गई। पुत्र जन्म का आनंद उल्लास हवा हो गया।खिन्नता ऐतराजी की कसक ने गुणसेन के दिल को छलनी कर दिया।धीरे धीरे वे महल में लौटे। अपने खंड में आकर गहरी निराशा की गर्ता में डूब गये। राजकुमार के जन्म के समय तय कर के, कुमार की जन्म कुंडली बना कर, राजपुरोहित सोमदेव, महाराज के पास आकर खड़े रहे। परंतु महाराज को व्यथा से क्षत-विक्षत हुए देखकर वे कुछ बोल नही पाये। डबडबायी निगाहो से सोमदेव की और देखा। सोमदेव ने प्रणाम कर के कहा मेरे योग्य कुछ आज्ञा हो तो फरमाइये, महाराज। महाराज की आँखें अब चुने लगी थी।

महाराज ने भराई आवाज मे कहा मैं महापापी हूं। अभागा हूं, सोमदेव आज भी महातपस्वी अग्निशर्मा को पारणा नही करवा सका। पुत्र जन्म के अनंदोंन्माद में उत्सव रमणता में मैं उन महातपस्वी को एक बार फिर भुला बैठा। पारणे के लिए आग्रहपूर्वक निमंत्रण दिया रोजाना पारणे के दिन की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा करता रहा, आज पुनः वो ही पुरानी गलती दोहरा बैठा।पुत्र जन्म का अभुददय मेंरे लिए आपत्ति रूप बन गया। अब मै उन महात्मा को मेरा मुँह बताने लायक नही रहा। और न जाने उन महात्मा के दिल मे मेरे लिए कैसे कैसे भाव जगे होंगे। क्या किया होगा उन्होंने। सोमदेव तुम मेरे आत्मीयजीन हो तुम, अविलंब तपोवन में जाओ, कोई तुम्हें पहचान न पाये उस ढ़ंग से उस महात्मा का वृतांत जानकर आओ। वापस त्वरा से लौटना।

मेरा दिल न जाने क्यों आज किसी अव्यक्त भय से थरा रहा है। किसी अनर्थ की पदचाप सुनाई दे रही है। नरनाथ आप शान्त होइए। स्वस्थ बनिये। जो होनी है उसे कौन टाल सकता हैं? अब संताप किस बात का ? राजन मै जाता हूँ तपोवन में और वहाँ का व्रतांत जानकर शीघ्र ही आपके चरणों मे उपस्थित होता हूँ। पुरोहित सोमदेव अस्वरूढ होकर तपोवन की और चल दिये।

आगे अगली पोस्ट मे…

अग्निशर्मा का अनशन – भाग 7
April 10, 2018
अग्निशर्मा का अनशन – भाग 9
April 10, 2018

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