एक बार गुरु नानक मुलतान शहर पहुचे , पुरे शहर मे यह खबर फेल गई कि पहुचे हुए फकिर है, जो लोगो की हर तरह की पीड़ा दूर करने की कूवत रखते है । आम लोग उनहें बहुत पसंद करने लगे और उनकी ख्याति दिन दूनी रात चौगुनी बढने लगी और लोग उनके हुज़ूर में पहुचने लगे । लेकिन उनकी बढती ख्याति वहां के पीरो – पुकीरो को पसंद नही आई और उन्होने उनकी परीक्षा लेनी चाही कि यह व्यक्ति कोई देव पुरूष है या ढोंगी ?
उस शहर मे करामाती पीरो – पुकीरो और पहुचे हुए लोगो का जमघट था । उन्होने नानक देव के पास दुध से लबालब भरा एक कटोरा भेजा । इसका अभिप्राय यह था कि जिस पकार इस भरे कटोरे मे अब और एक बुंद दूध के लिए भी जगह नही , उसी पकार मुलतान शहर मे पीरो -पुकीरो को इतना आघिक्स है कि यहा तुम्हारे लिए जगह नही ।
नानकदेव ने अभिप्राय समझ लिया । उन्होने उस गिलास में दी बताशे ङाल दिये और ऊपर से एक गुलाब का फूल भी रख दिया । इसका अभिप्राय यह था कि बताशे अपने माधुर्य से जिस पकार दूध को मीठा कर देते है तथा फूल में रहते हुए भी दूध बिगड़ नही रहा है बल्कि उससे सुगंध निस्सत हो रही है , उसी पकार मेरे यहां आने से आपको कोई हानि नही पहुचेगी , उलटे सत्संग और ज्ञान का लाभ ही होगा ।
यह देख वे पीर- पुकीर जान गए कि यह व्यक्ति कोई साधारण नही बल्कि पहुचा हुआ है । उन लोगो के मुख से सहसा उदगार निकल पडे , आप सचमुच सिध्द पुरूष है । आइए हम आपका स्वागत करते है और उन्होने नानक दल के साथ एकसाथ बैठकर सत्संग किया । ठीक ही कहा जाता है कि संतो की गति न्यारी ।
