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सम्यग् ज्ञान और संयम

Equitable-knowledge-and-patience

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महाभारत में युधिष्ठिर जैसे पुन्यशाली को भी कहना पड़ा कि
जानामि धर्मं न च मे प्रवृततिः। जातम्यधर्मं न च मे निवृततिः ।। में धर्म को जानता हूं फिर भी उसी तरह प्रवृत्ति नहीं कर पाता ।

मैं अधर्म को जानता हूं , फिर भी उस से छूट नहीं पाता ।
यहां प्रश्न खड़ा होता है कि ज्ञान किस कारण आचरण में नहीं आ पा रहा है ? नैतिक जीवन की यह बड़ी से बड़ी समस्या है और उसका हल निकाले बिना छुटकारा नहीं है ।

मनुष्य का जीवन उसकी स्वाभाविक बनी हुई वृत्तियों से गतिमान होता है । मनुष्य के भीतर में रही ये वृतिया मन पर आकर अनेक कामनाओं का रूप लेती है । उसके आवेग से आकर्षित होकर मनुष्य उसी प्रकार की प्रवृत्ति में प्रवृत्त हो जाता है ।

इन व्रत्तियो का योग्य रूप से संचालन करने में आए तो वह जीवन को हानिकारक साबित हो सकता है । योग्य संचालन में आए तो वह जीवन को हानिकारक साबित कर सकता है । अतः ज्ञान यह नैतिक जीवन की आंख के स्थान पर है । चरित्र बनाने में या नीति के मार्ग पर चलने में ज्ञानरूप चक्षु की और बुद्धिमय प्रकाश की अत्यंत ही जरूरत रहती है । यह ज्ञान मात्र शब्दिक किया पोपट जैसा हो तो किसी काम का नहीं है ।

प्रचलित मान्यताओं को स्वीकार कर , लोग ज्ञान की अच्छी-अच्छी बातें करते हैं , परंतु उसका पूरा अर्थ समझते नहीं , तो मर्म कहां से समझेंगे ? यानी आवेग उत्पन्न होने से उनका ज्ञान साफ हो जाता है और उनका आचरण विपरीत स्वरूप का बन जाता है । वे बोलते और मानते हैं कि ईश्वर सर्वदर्शी है , फिर भी पाप करते पीछे मुड़कर नहीं देखते । ईश्वर के देखते पाप किस प्रकार हो सकता है ? यह प्रश्न उन्हें भाग्य से ही होता है ।

ज्ञान सिर्फ जानकारी रूप एवं संकुचित होगा तब तक उसका स्व एवं पर के हित में खास उपयोग नहीं हो सकता ।

ज्ञान का स्वरूप प्रतीति जैसा होना चाहिए । प्रतीति यानी अनुभव में आया हुआ , प्रमाणबद्ध ज्ञान! जिससे सिर्फ ऊपरी स्तर का ख्याल ना हो, परंतु अंतः करण की अनुभूति हो।
प्रतिति युक्त ज्ञान में ही चरित्र का सच्चा दर्शन रहा है । अनुभव उपरांत उसमे वास्तविकता और आवश्यकता का दबाव भी रहना चाहिए । सिनेमा के दृश्यों में सिंह दीखते कोई भाग नहीं जाता क्योंकि उसमें सिंह की प्रतीति होने पर भी छलांग मारने की वास्तविकता नहीं है और उसी कारण भाग जाने की आवश्यकता का दबाव नहीं है । यहां केवल प्रतीति परिमाणहीन प्रसंग बन जाती है ।

आवेगो का तूफान पैदा होता है , तब प्रतिति की पतवार हाथ में से निकल जाती है , बुद्धि का प्रकाश और स्मृति की चमक घट जाती है । हम तूफान का सामना नहीं कर सकते और तूफान शांत होते ही विषाद में डूब जाते हैं । प्रतिति होने के बावजूद मानसिक निर्बलता के कारण हम गिर जाते हैं ।

तब मार्ग क्या ? प्रतिति सफल न हो फिर भी प्रतीति तो प्रतीति ही है! वः सूचन तो करती ही रहती है ।

प्रतिति को सफल करने के लिए उपाय संयम है । मन के आवेगो को निरंतर संयम रखने का अभ्यास करना चाहिए । आवेगो को निग्रह से , व्रत नियम से संयमित बनाना चाहिए । आवेगों को अवसर मिले उसके पहले ही उनको संयमित करके संस्कारी और अनुशासन बद्ध बनाना चाहिए ।

प्रतिदिन के आचार से मिल जाने से आवेग धीरे-धीरे हाथ में आते हैं और अंत में जीवन रथ के आज्ञानंकित घोड़े बनते हैं । सदा सर्वदा यदि आचार की साधना न हो तो विद्वान को भी विषाद में फंस जाना पड़ेगा । आचार में ही विद्वता की सफलता है ।

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