एक बार की बात है गरुड़ देव कैलाश पर्वत पर गए। भव्य जिनालयों की वंदना कर
बाहर निकले। तब कैलाश की अपूर्व प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी।
चिड़िया कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारा ध्यान उसकी तरफ आकर्षित होने लगा।
उसी समय कैलाश पर यम देव पधारे और जिनालय में अंदर जाने से
पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की दृष्टि से देखा। गरुड़ समझ गए उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव के कैलाश से निकलते ही उसके प्राण चले जाएँगे।
गरूड़ को दया आ गई। इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे।
उसे अपने पंजों में दबाया और कैलाश से हजारो कोश दूर एक
जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया, और खुद बापिस कैलाश पर आ गया।
आखिर जब यम बाहर आए तो गरुड़ ने पूछ ही लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों देखा था?
यम देव बोले गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो
चिड़िया कुछ ही पल बाद यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग द्वारा खा ली जाएगी।
मैं सोच रहा था कि वो इतनी जल्दी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर अब जब वो यहाँ नहीं है,
तो निश्चित ही वो मर चुकी होगी।
गरुड़ देव समझ गये “मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए।
इसलिए आचार्य देव कहते है। करता तू वह है, जो तू चाहता है।
परन्तु होता वह है, जो कर्मो का लिखा होता हैं।
स्वयं को पर का कर्ता मत मान स्वतः परिणमति वस्तु के क्यों करता बनते जाते हो।
जो होना है वह निश्चित है, केवलज्ञानी ने गाया है-
सो हे आत्मन! कर्म के उदय को बदलने में शक्ति व समय व्यर्थ न गवा,
वह नही बदला जा सकेगा।
स्व पर दृष्टि कर आत्महित का पुरुषार्थ कर तो भव से पार हो जायेगा।
सभी अपने स्वरूप में सावधान रहे यही मंगल भावना हैं।
