शास्त्रकारो या महात्माओं के उपदेश रूप वचन तभी लाभदायीं बनते हैं, जब उनके द्वारा जीवात्मा परमात्मा से सीधे संबंध में आता हो।
मनुष्य अंतरमुर्ख होकर खोज करें तो ही अंत में उसे अनुभव होता है कि वह स्वयं परमात्मा का स्वरूप है।
भक्ति यह मन की एकाग्रवृत्ति है। अविच्छिन्न परानुरक्ति है, जो सभी सुख के निधान स्वरूप परमात्मा को अपना ध्येय समझकर उसमें तन्मय बनती है। परमतत्व के साथ एकमेंक होने का, एकरूपता साधने का उपाय भक्ति है। भक्ति से परमतत्व रूप परमात्मा की अभिव्यक्ति होती है।
आप से अत्यंत दूर रहें किसी परमात्मा के लिए भक्ति नहीं है। परंतु भक्ति आपके अंतर्यामी के लिए है जो आपका मूल स्वरुप है। भगवान आप स्वयं ही हो, स्व आत्मा के मूल स्वरूप को प्रकट करने के लिए ही भक्ति है। इस वास्तविकता को जानना, समझना और उसके द्वारा परम तत्व परमात्मा के साथ परम मधुर मिलन का आनंद अनुभव करना यह मानव जीवन का अंतिम ध्येय है।
साधक में परमात्मा को पाने की तीव्र आतुरता होनी चाहिए।
ध्येय युक्त एकाग्र साधना द्वारा दिक-काल से परे सिर्फ सत् भूमिका पर साधक को पहुँचना चाहिए, जो अनंत है, निर्विध है, सच्चिदानंद है।
‘भिन्नता को दूर करें वह भक्ति’ आत्मा को परमात्मा स्वरुप बनावे वह भक्ति! इस कारण साधक आत्मा को परमात्मा को अपने ह्रदय सिंहासन पर विराजमान करना है, जो परम प्रेम और परमानंद स्वरूप है।
परमात्मा के साथ संबंध कर, सभी प्राणियों को एक समान चाहकर वे सभी अपने ह्रदय में रहे परमात्मा के ही बाहर प्रगट हुए स्वरूप है, ऐसा समझकर सभी के साथ उचित व्यवहार करना चाहिए।
जीव-जीव के बीच भेदबुद्धि दूर हुए बिना सच्ची भक्ति प्रकट नहीं होती। उसे दूर करने का सर्वोत्तम उपाय है-ह्रदय परमात्मा को सौंप देना। इससे सभी जीव स्व-ह्रदय वाले बनते हैं। सह्रदय बनते हैं।
भक्ति यह मुक्ति की दूती है। भगवान के प्रेमी पर भगवान जितना ही प्रेम चाहिए।
