एक मुनि… अनाथी जिसका नाम…
बन में एक पेड़ के निचे ध्यानस्थ खड़े हैं। वहाँ मगध राज श्रेणिक अपनेरसाले के साथ क्रीडा करने पधारते हैं और मुनि को देखकर चकित हो जाते हैं। मुनि की कंचनवर्णी काया, सुन्दर मुख और गुणशालिनी तरुण अवस्था देखकर मुनि को पूछते हैं, अरे मुनि, यह वेष क्यों धरा हैं? इस युवा उम्र को क्यों वैराग्यवान बनाया? इस उम्र में धन एवं यौवन का उपभोग को नहीं करते! अवसर आने पर भले ही बैरागी बनो, लेकिन इस उम्र में कुटुम्ब, धन, यौवन क्यों छोड़ दिया?!!!
मुनि ने कहा: राजन! मैं अनाथ हूँ। अनाथ होने से संसार छोड़ा हैं। श्रेणिक राजा ने कहा: मैं आपका नाथ बनूँगा। जो चाहोगे ववाह दूंगा, चलिए मेरे साथ राज्य में।
मुनि ने कहा, ‘अरे भाई! तूं भी अनाथ हैं, तूं कैसे मेरा बनेगा? देख! सुन, मेरे घर में इन्द्राणी जैसी सुशील गुण से मेरी स्त्री थी, मेरे माँ, बाप, चाचा, चाची, मामा, मौसी, बहिन, भांजे थे। सब प्रकार कि साहिबी थी। सब प्रकार के भोग मैं भोगता । एक दिन मुझे रोग ने गेर लिया, बहोत दर्द और पीड़ा हो रही थी। वैधों ने दावा दी, मंतर-जंतर किये, लेकिन किसी भी प्रकार से दु:ख कम न हुआ। मेरे सगे, सम्बन्धी, माँ-बाप,मेरी स्त्री कोई भी मेरा दु:ख लेने तैयार न हुए। दुःख मैं भोगता ही रहा । कोई सहायता काम न आई। ऐसे अति दुःख के समय मैंने सोचा कि मेरा कोई नहीं हैं, मैं अकेला ही हूँ, इस दुःख से छुट जाउँगा तो शीग्र ही संयम ग्रहण करूँगा – ऐसा मन ही मन ठानलिया। धीरे धीरे पीड़ा घटती गई। प्रात: तक तो पीड़ा पूर्णरूपसे गायब हो गई और मैं निश्चय अनुसार घर से निकल पंडा, संयमले लिया। हे राजन! मुझे पक्की समझ आ चुकी थी, मैं अनाथ ही था, अब मैं सनाथ हूँ।’ यह सुनकर श्रेणिक महाराजा को बोध प्राप्त हुआ और स्वीकार किया कि सचमुच! आपका कहना सत्य हैं, मैं भी अनाथ ही हूँ, आपका नाथ कैसे हो सकता हूँ? मुनि की प्रशंसा करके शीश झुकाकर वंदना करके श्रेणिक अपने महल पधारे। मुनि चरित्र पालन करके शिवपुरी पहुंचे।
