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पारणा नहीं हो सका। – भाग 9

एक वयोवुद्ध तापस ने राजा का अभिवादन करते हुए कहा :
‘राजन , बैठिये , इस आसन पर । हम सब आपका हार्दिक स्वागत करते है ।’
राजा के चेहरे पर लाज – शरम और ग्लानि की रेखाएं उभर रही थी । वह नतमस्तक हो आसन पर बैठा । परंतु कुलपति के सामने देखने की उसमे हिम्मत नहीं थी । राजा की ऐसी बेबसिभरी उद्विग्नता देखकर कुलपति ने कहा :
‘वत्स , तुम इतने परेशान क्यों नजर आ रहे हो ? कहने योग्य हो तो चिंता का कारण बताओ ।’
राजा ने कहा : ‘आप भगवान के पास क्या छिपाने का होता है ? और फिर कही न जा सके वैसी बात लेकर उद्विग्न आदमी को तपोवन में आना भी नहीं चाहिए ।’
कुलपति ने कहा :
‘राजन, तुम्हारा विवेक योग्य है । अब चिंता का कारण कहो ।’
‘प्रभो , आपकी आज्ञा है, तो कहता हूं । वर्ना…. ऐसा निर्दय और घोर कुत्य आपसे कहने को दिल तैयार नहीं होता ।’
‘वत्स , तपस्वीजन तो सभी जीवों के प्रति मातृवत स्नेह रखनेवाले होते है । मां के पास बेटा शरम रखेगा सही ? इसलिए मेरे समक्ष तुझे शरम रखने का कुछ कारण नहीं है । जो भी है , कह दे । सही कारण जानकर शायद किसी भी उपाय से मैं तेरा उद्वेग दूर कर सकूं तो ।’
‘भगवंत…. तब मैं मेरा ह्रदय आपके समक्ष खोल देता हूं ।
मैं दुर्जन और अविचारी हूं । तरुण अवस्था में इस अग्निशर्मा को मैंने बहुत सताया था…. भयंकर पीड़ा दी थी । मेरे कारण ही परेशान होकर वह क्षितिप्रतिष्ठित नगर छोड़कर चला गया था । और इस तपोवन में आकर तापस बन गया। भगवंत , ऐसे उत्तम व्रत को धारण करनेवाले के साथ…. मैंने अब भी , लाखों बरस बीतने पर भी… दुर्जनता का परिचय दिया। अयोग्य आचरण किया । इससे मैं अत्यंत उद्विग्नता से बेचैन हूं ।’
कुलपति ने वात्सल्यभाव से कहा : ‘वत्स, यदि बात इतनी सी है तो संताप करना छोड़ दे । यदि तेरे निमित्त अग्निशर्मा तापस बन गया है… तब तो तू ही उसका धर्म – प्रवर्तक और कल्याणमित्र बना है । फिर क्यों तू उलझन महसूस कर रहा है ? तू परलोक का डर रखनेवाला है । धर्मशास्त्रो का ज्ञाता है । तू कुछ भी अयोग्य आचरण करे… यह बात मेरे मानने में तो नहीं आती । फिर भी तू कहता है…. कि ‘मैंने दुर्जनता प्रदर्शित की है… अयोग्य आचरण किया है, तो बता तो सही ऐसा कौन सा गलत आचरण तूने किया है ?’

आगे अगली पोस्ट मे…

पारणा नहीं हो सका। – भाग 8
March 16, 2018
पारणा नहीं हो सका। – भाग 10
March 16, 2018

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