‘देवी , सारा कसूर मेरा ही है । मुझे राजपरिवार को , विशेष करके राजमहल के द्वारपालों को कल ही सुचना दे देनी चाहिए थी… कि ऐसे गेरुए वस्त्रधारी कुशकाय तपस्वी आये तो उन्हें आदर-सत्कार पूर्वक बुलाना….और हमे शीघ्र ही सुचना देना ।’
‘परंतु , वैसी सुचना देने का प्रयोजन ही नहीं था , कल ही हमने निर्णय कर लिया था कि सबेरे हम दोनों स्वयं , उन महातपस्वी का स्वागत करने के लिए महल के द्वार पर खड़े रहेंगे । सच्चे मोतियों से उनका स्वागत करेंगे । देखिये,….. मैंने इस स्वर्णथाल में मोती भी तैयार रखे थे ।’ रानी ने एक आसन पर रखे हुए स्वर्ण थाल की ओर उंगली की ।
‘तुम्हारी बात सही है । हम हमारे तौर पर सही होंगे शायद…. पर उन महात्मा के महीने के उपवास का पारणा न हुआ यह भी उतनी ही दुःखद वास्तविकता है ना ? कितना कष्ट हुआ होगा उन महात्मा को ? देवी, एकाध दिन के उपवास का पारणा हो , फिर भी विलंब हो तो हमारी क्या हालत होती है ? और अब तो वे दूसरे महीने के उपवास चालू कर देंगे ।’
राजा की एक शिरोवेदना दूर हुई ।
दूसरी शिरोवेदना चालू हो गई ।
शारीरिक वेदना का अंत आ गया…. पर मानसिक वेदना का उदय हो गया । राजा का भक़्त ह्रदय पारावार पीड़ा का अनुभव करने लगा । उन्होंने रानी से कहा :
‘देवी, हमे अभी-इसी वक़्त तपोवन जाना चाहिए । उन महात्मा से वापस महल में पधारने का आग्रह करें…। वे यदि आना कबूल ही न करें , तो उनकी क्षमा मांग कर वापस लौटेंगे ।’
‘स्वामीनाथ, आज तो वैधों ने आपको इस खंड के बाहर भी कदम रखने की मनाही की है । इसलिए आज तो तपोवन में जाना असंभव है । कल यदि आप पूरी तरह स्वस्थ होंगे , तो अवश्य चलेंगे ।’
वहां पर उपस्थित मंत्रीवर्ग ने , वैधों ने , मांत्रिकों ने एवं तांत्रिको ने , सभी ने एक स्वर से महाराजा को तपोवन में जाने से रोका । महाराजा मौन रहे । महारानी ने सभी को खण्ड छोड़कर जाने का संकेत किया । और महाराजा से स्नान वगैरह नित्यक्रम से निपटने के लिए प्रार्थना की ।
तपोवन के बाहर ही रथ को खड़ा रखकर , राजा-रानी रथ में से नीचे उतर गये । पैदल चलकर वे तपोवन में गये । तपोवन के सभी तापसों ने राजा – रानी को तपोवन में प्रवेश करते हुए देखा। सभी कुलपति के निवास की ओर चले । सभी तापसों के दिल में राजा के लिए स्नेह एवं सदभाव था । शरम और विनय से नतमस्तक बने हुए राजा के प्रति तापसों के दिल में सहानुभूति पैदा हुई थी ।
–राजा ने कुलपति वगेरह तापसों के दर्शन किये ।
— कुलपति को राजा ने विधिपूर्वक प्रणाम किये ।
— कुलपति ने और सभी तापसों ने राजा को आशीर्वाद दिये ।
आगे अगली पोस्ट मे…