राजा गुणसेन अंतःपुर में रानी वसंतपुर के पास गया ।
‘देवी, अभी – इसी वक़्त मुझे युद्ध यात्रा के लिए प्रयाण करना होगा । राजा मानभंग ने हमारी सोयी हुई सेना का भयंकर संहार कर डाला है ।’
राजा शस्त्रसज्ज हुआ ।
रानी वसंतपुर ने राजा के मस्तक पर विजय का तिलक किया ।
राजमहल के विशाल पटंगण में हस्तिसेना , अश्वसेना , रथसेना और भूमिसेना क सैनिक आ रहे थे । हाथियों के चिंघाड़ से और घोड़ों के हिनहिनाने से वसंतपुर नगर ध्वनिमय हो चूका था ।
राजपुरोहित जमीन पर गिरनेवाली छाया के गणित से शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहे थे ।
‘महाराजा , शुभ मुहूर्त का समय आ रहा है, सावधान ।’
उसी समय राजा गुणसेन को अग्निशर्मा की स्मृति हो आई । उनकी निगाहें राजमहल के प्रवेश – द्वार की ओर गई। चेहरे पर उलझन उतरने लगी ।
‘पुरोहितजी , आज उन महातपस्वी अग्निशर्मा के दो महीने के उपवास के पारणे का दिन है । मेरी अति आग्रहभरी प्रार्थना से कुलपति ने मुझे पारणा करवाने की अनुज्ञा दी थी , इसलिए अब उस महात्मा को पारणा करवाने के बाद ही प्रयाण करेंगे । उन महात्मा को प्रणाम कर के , उनके आशीर्वाद लेकर बाद में ही प्रस्थान करेंगे । इसलिए प्रवेश द्वार पर ध्यान रखिएगा । वे महात्मा पधारें तो हम उनका स्वागत करें ।’
वहां पर खड़े एक युवक ने कहा :
‘महाराजा, एक कुशकाय और गेरुए वस्त्रधारी तापस यहां पर पधारें थे ….। कुछ देर खड़े भी रहे , परन्तु मदोन्मत्त हाथी और हिन – हिनाते हजारों घोड़ो को देखकर वे घबराये से नजर आ रहे थे …। ‘अभी किसी हाथी या घोड़े की टक्कर लगी तो….?’ ऐसे डर से वे वापस लौट गये । परंतु अभी तक वे नगर के बाहर नहीं निकले होंगे । ऐसा मुझे लगता है ।’
युवक को बात सुनकर महाराजा की ऑंखें भय से विस्फारित हो गई । एक साथ जैसे कि सैंकड़ो बिच्छू ने उन्हें काटा हो वैसी वेदना महसूस की उन्होंने । उन्होंने कातर स्वर में कहा : ‘मैं उस महात्मा को बुलाने के लिए जाता हूं ।
त्वरा से महाराजा नगर के द्वार की ओर चले । पीछे पीछे मंत्रीवर्ग और अंगरक्षक दौड़े । युद्धयात्रा कुछ देर के लिए रुक सी गई । राजपुरोहित सोमदेव ने दूसरे मुहूर्त की छाया नापने के लिए शंकु वापस रखे ।
अग्निशर्मा नगर में से निकल ही रहा था कि महाराणा गुणसेन पहुँच गये। भक्तिपूर्ण आदर से तपस्वी के चरणों में लेट गये । खड़े होकर , बहुमान पूर्वक बिनती की :
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