— राजा गुणसेन रानी वसंतसेना के साथ रथ में आरुढ़ होकर नगर में पहुँचे । राजमहल में जाकर आनंद प्रमोद में निमग्न हुए ।
—- ज्ञान — ध्यान में निमग्न योगी पुरुषों को समय का खयाल रहता नहीं है । रंग राग में निमग्न रहनेवाले भोगी पुरुषों को भी समय का खयाल कहां रहता है ? बरसों के बरस बीत जाने में भी देर कहां लगती है ? तब फिर एक महीने के तीस दिन बीतने में कितना समय लगता है ?
महीने पूरा होने में एक ही दिन बाकी है । महाराजा गुणसेन रानी से कहते है : ‘देवी, कल सबेरे महातपस्वी अग्निशर्मा का पारणा है…. याद रखना। वे महानुभाव कल सबेरे हमारे वहां आएंगे ।’
‘नाथ, आपने याद दिलाया , यह अच्छा किया …. मेरे दिमाग में से तो यह बात बिल्कुल निकल गई थी ।’
‘द्वारपालों को भी सुचना दे देनी चाहिए ।’
‘क्या जरूरत है, स्वामिन ? हम स्वयं राजमहल के द्वार पर खड़े रहकर उन महात्मा का स्वागत करेंगे । महल में लाकर उनकी पूजा करेंगे…. उत्तम खाघ पदार्थो से उन्हें पारणा करवायेंगे ।’
‘दो महीने के उपवास का पारणा है । ६० दिन के उपवास का पारणा। और दूसरे दिन से ही और एक महीने के उपवास शुरु कर देंगे ।’
‘ऐसे महातपस्वी को हमारी वंदना। कितने शांत और प्रशांत हैं वे महात्मा ? कितनी मधुर और प्यारी उनकी वाणी है ?’
‘ऐसे महात्मओं के आशीर्वाद कभी अशक्य को शक्य बना डालते है और असंभव को संभव में परिवर्तित कर देते हैं ।’
राजा – रानी रात्रि के प्रथम प्रहर में अग्निशर्मा के , कुलपति के , आश्रम के अन्य तपस्वियों के गुणगान करते रहे…. दूसरे प्रहर में वे निद्राधीन हुए ।
चौथे प्रहर के प्रारंभ में राजा – रानी ने निद्रात्याग किया। राजमहल के रसोईघर में जाकर रसोइये को अग्निशर्मा के पारणे से संबंधित तैयारी करने की सूचनाएं दी ।
इतने में दो घुड़सवार सैनिक बेतहाशा दौड़ते हुए राजमहल के द्वार पर आकर खड़े रहे ।
आगे अगली पोस्ट मे…