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हादसा दोहराया फिर। – भाग 1

अपने पास में खड़े वुद्ध-प्रशांत तापस से कुलपति ने कहा : जाओ , उस महानुभाव अग्निशर्मा को बुला लाओ ।’
वुद्ध तापस ने अग्निशर्मा के पास जाकर , उसका अभिवादन कर के कहा :
‘महानुभाव, आपको कुलपति याद करते हैं ।’
अग्निशर्मा अपने आसन पर से खड़ा हुआ और वुद्ध तापस के साथ कुलपति के पास आया । कुलपति ने प्रेम से उसका स्वागत किया , बहुमान पूर्वक उसका हाथ पकड़कर , अपने पास आसन पर बिठाकर कहा :
‘वत्स, तू पारणा किये बगैर राजमहल से वापस लौट आया…. इससे राजा बहुत ही संतप्त है । उसका दिल अपार व्यथा से व्यग्र है।’ राजा गुणसेन की आंखें बरसने लगी। कुलपति ने कहा :
‘वत्स, देख तो जरा , यह राजा कितना रो रहा है । कल इसे भयंकर शिरोवेदना पैदा ही गई थी । वेदना से पराधीन बना हुआ राजा तुझे बुला भी न सका… न तेरा सत्कार कर सका…. उसमे इसका तनिक भी अपराध नहीं है ।’
अग्निशर्मा ने कहा : ‘आपकी बात सही है भगवंत । राजा को संताप नहीं करना चाहिए ।’
‘वत्स , राजा का कहना है कि जब तक यह महातपस्वी अग्निशर्मा मेरे घर पर पारणा नहीं करेंगे…. तब तक मेरी सन्तप्त आत्मा को चैन मिलनेवाला नहीं है ।’
अग्निशर्मा ने कहा : ‘भगवंत, जैसी आपकी आज्ञा । राजा बिना वजह संताप अनुभव कर रहा है । चूंकि उसने मेरे परलोक के विरुद्ध कुछ भी नहीं किया है । वह तो मेरी तपोवुद्धि में सहज निमित्त बना है ।’
राजा आश्वस्त हुआ । वह बोला : ‘सचमुच इन महात्मा की महानता कैसी अदभुत है । मेरी गलतियों को वे उपकारक मानकर… मुझे निर्दोष सिद्ध कर रहे हैं ।’
–अग्निशर्मा आम्रवुक्ष के नीचे अपने आसन पर बैठा और आत्मध्यान में निमग्न हुआ ।

आगे अगली पोस्ट मे….

पारणा नहीं हो सका। – भाग 10
March 16, 2018
हादसा दोहराया फिर। – भाग 2
March 22, 2018

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