बचपन मे मैं जानबूझकर उसे दुःख दिया। उसका उत्पीड़न किया।और अभी जबकि यौवन उतरावस्था है तब, उस महात्मा को सुख ही देने की इच्छा होने पर भी, सुख नही दे सका। उनके दुःख में ही निमित्त बना। मुझे क्या मालूम था कि वह ब्राम्हणपुत्र अग्निशर्मा, क्षितिप्रतिष्ठित नगर से भागकर इस तपोवन में आकर तापस बन गया है। यहाँ इस नगर मे आने के बाद भी मुझे कहा पता था कि जिसे मैने और मेरे मित्रो ने भयंकर यातनाएं दी है वह अग्निशर्मा वही के तपोवन मे तापस बन कर रहा हुआ है। मेरा यहां वसंतपुर में आना तपोवन में जाना कुलपति का निमन्त्रण मिलना वहाँ जाना और अग्निशर्मा के दर्शन होना यह सब कैसे हो गया ? क्यो मैने पारणे के लिए उसे इतना आग्रह किया? यदि मेने पारणे का निमंत्रण ही नहीं दिया होता और केवल दर्शन कर के वापस लौट आया होता तो इतना दुःखद परिणाम नही आता। परत मेरे मन में उस महातपस्वी के प्रति बहुमान पैदा हो गया था।उसके शरीर की बदसूरती मुझे दिखाई नहीं दी। उसके व्रत उसकी तपश्चर्या ने मुझे बरबस खिंच लिया अपनी ओर। अच्छा होता यदि उसकी कुरूपता ने मेरे मन मे दुराव या दुर्भाव पैदा कर दिया होता। मै उसे पारणे के लिए आमन्त्रण ही देता नही। वह मेरे महल पर आता ही नही तो आज जो दुष्परिणाम आया है वह नही आता।
ठीक है, उसकी अति उग्र तपश्चर्या और पारणे की विशिष्ट प्रतिज्ञा से प्रभावित होकर पहली बार मेने पारणे के लिए निमंत्रित किया। मै शिरोरोग की वेदना से संत्रस्त हुआ। और पारणा नही करवा सका। फिर भी उस महात्मा के दिल मे मेरे लिए वैरभाव या दुश्मनी का भाव पैदा नही हुआ था। उस समय मे भावावेश में बह गया औऱ फिर से पारणे के लिए मैने बहुत ही आग्रह किया। यदि उस समय मेने जिद्द नहीं की होती तो कुलपति उस तपस्वी को मनाकर मेरी प्रार्थना का उससे स्वीकार नही करवाते। और तब यह आज की परिस्थिति पैदा नही होती। परन्तु ऐसा क्यों हुआ ?उस तपस्वी के बराबर पारणे के दिन ही मुझे भयंकर शिरोवेदना क्यों हुई ?दूसरे पारणे के दिन युद्ध-प्रयाण का मामला क्यों सामने आया ?और तीसरे पारणे के दिन ही पुत्र-जन्म क्यों हुआ?
आगे अगली पोस्ट मे….