राजन, अभी तो वह महात्मा ध्यान में लीन है। इसलिए तुम इस वक़्त तो उसके दर्शन नहीं कर सकते। उसके ध्यान में क्यों खलल करना ? इसलिए इस समय तो तुम नगर में लौट जाओ, और किसी दिन आकर दर्शन कर लेना। राजा ने मुरझाए चेहरे से कातर स्वर में कहा। जैसी आपकी आज्ञा, में फिर कभी आऊँगा। राजा खड़ा हुआ।कुलपति को नमस्कार किये औऱ नगर की ओर धीरे कदम रखता हुआ वापस लौटा। उसकी तमाम आशाए उमगे सब कुछ राख हो चुका था। दुःख वेदना आँसू के अलावा जैसे अब उनके पास कुछ भी नही बचा था।कुलपति के पीछे खड़े मुनिकुमार के दिल में राजा के प्रति सहानुभूति उभर आई। वे राजा के साथ तपोवन के बाहर निकले और धीरे से राजा को कहा।महाराजा, कुलपति को शब्दों का आप बुरा मत मानना। कुलपति के दिल तो आपके प्रति वात्सल्य है, पर यह तो आप जब अभी तपोवन में पधारे ओर अग्निशर्मा को समाचार मिले, तब उन्होंने कुलपति को बुलाकर क्रोधाविष्ट हो अति क्रोध मे कहा मुझे उस पापी राजा का काला मुँह नही देखना है, उसे मेरे पास मत आने देना। उसे वही से विदा कर दो। इसलिए कुलपति आपकी ओर आये और अग्निशर्मा के पास नहीं जाने के लिए आप से कहा।अग्निशर्मा कोई ध्यान मे नही बैठे है, वे तो आज सुबह से, आपके वहाँ से लौटने के बाद से, आप ही के दोष बोल रहे है। अत्यंत गुस्से में ज्वालामुखी की भांति बरस रहे है। मुनिकुमार खड़े रह गये। राजा और राजपरिवार ने मुनिकुमार को प्रणाम किया। मुनिकुमार की आंखे आँसुओ से गीली हो उठी। वे त्वरा से तपोवन में वापस लौटे। वे मन ही मन मे बोले अब महाराजा शायद कभी भी इस तपोवन में नही आयगे। महाराजा ने भोजन नही किया। वे सीधे ही अपने शयनखंड में गये। प्रतिष्ठित को बुलाकर सूचना दे दी आज में किसी से नही मिलूंगा। किसी को मेरे खंड मे प्रवेश मत देना। पश्चिम दिशा के वातायन की खिड़की खोलकर महाराजा वहाँ पर रखे हुए आसन पर बैठे। पश्चिम दिशा में रमणीय उद्यान था। आम्रवृक्ष चंपकवृक्ष और अशोकव्रक्षो की घटाए थी।निर्दोष मासूम पशु-पक्षी वहाँ पर मुक्त मन से निर्भीक होकर अठखेलियां खेल रहे थे। महाराजा गुणसेन निर्निमेष नयनो से उद्यान की ओर देख रहे थे। उनका चित्त अस्वस्थ था। व्यथित था। विचारों का बवंडर मचा हुआ था दिलो दिमाग पर।
आगे अगली पोस्ट मे….