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हादसा दोहराया फिर। – भाग 9
‘दो-दो महीने के उपवास हो गये… तीसरे महीने के उपवास की उसने कुलपति के पास प्रतिज्ञा भी ले ली… फिर भी कितनी समता है उन महातपस्वी को । शरीर के प्रति कितनी विरवित है उनकी ।’ ‘आज … सच्ची तपस्विता के दर्शन हुए ।’ ‘महाराजा के प्रति कितनी सहानुभूति व्यक्त्त की उस महानुभाव ने ? महाराजा की सदभावना का कितना…
हादसा दोहराया फिर। – भाग 8
‘नाथ, जो होना निशिचत होता है ….. वही होता है …। उसे भला , कौन टाल सकता है ? आप शोकाकुल मत बनिए । हम अब एक महीने तक प्रतिदिन तपोवन में जाएंगे और उन महातपस्वी सहित सभी तापसों की सेवा – भक्त्ति करेंगे । इससे उनकी आत्मा को प्रसन्नता का अनुभव होगा …. और हमें भी संतोष मिलेगा ।…
हादसा दोहराया फिर। – भाग 7
राजा ने भद्रासन पर बैठते हुए कहा : ‘देवी, घोर अनर्थ हो गया । वे महातपस्वी अग्निशर्मा , महल के द्वार पर पधारे थे…। कुछ देर खड़े भी रहे…। किसी ने उनको बुलाया नहीं… स्वागत नहीं किया….। हाथी-घोड़े की फ़ौज को देखकर वे भय से विक्षुष्ध होकर वापस लौट गये ।’ ‘वापस लौट गये ? ओफ्फोह, यह तो बहुत ही…
हादसा दोहराया फिर। – भाग 6
जब तक राजा के महल में मैं पारणा नहीं करुंगा, तब तक इस महानुभाव का संताप दूर नहीं होगा । पहले भी कुलपति के समक्ष राजा ने यही बात कही थी। और कुलपति की आज्ञा से उस बात का मैंने स्वीकार भी किया था । अब भी इसकी आंखों के आंसू सूखे नहीं है। एक बड़े साम्राज्य का अधिपति इस…
हादसा दोहराया फिर। – भाग 5
‘भगवंत । वापस लौटिये, आवश्यक कार्य के लिए प्रयाण करने का होने पर भी , आपके आगमन की प्रतीक्षा में इतना समय विलंब किया है । आप महल के द्वार पर पधारे थे , परंतु मेरे परिवार में से किसी ने आपको पहचाना नहीं…. और आप त्वरा से एकदम निकल गये…. वापस पधारिए, प्रभो ।’ अग्निशर्मा ने कहा : ‘महाराजा,…