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इलाज

एक मकान का मालिक जिसे अपना घर बाहर से बहुत सुन्दर लगता था।बाहर से इतना अच्छा लगने लगा कि भीतर छोड़ बस बाहर ही रहने लगा।बाहर से रोज साफ करता और बाकी आसपास के मकानों से सुन्दर दिखाने में लगा रहता भीतर जाना भूल ही गया।बाहर से लोग तारीफ करते तो बहुत खुश रहता।धीरे धीरे अंदर गंदगी फैलने लगी।एक दिन दीमक सारे दरवाजें,खिडकियों से बाहर आने लगी तो घबराया कि मेरे मकान की सुदरता को क्या हो गया बाहर से साफ करे पर दीमक तो भीतर से आ रही थी।अंदर झाकें तो सारा घर बदबू से भरा हुआ भीतर जाया न जाये।बाहर से सफाई न हो पाये।

पछताया कि काश बाहर सफाई के साथ साथ भीतर भी साफ रखता तो आज मेरा घर भीतर बाहर से साफ रहता।

“अरे निर्मल”मकान है तेरा शरीर और मालिक है तूँ स्वयं ”

इस शरीर के मालिक तो है पर ध्यान सिर्फ बाहर चमड़ी,बाहरी दुनिया,बाहरी शरीर रूपी मकानों पर लगा रखा है।भीतर काम,कोध्र,लोभ,मोह का दीमक लग चुका है और बाहर इनिद्रयों के दरवाजों से बाहर भी प्रकट हो रहा है।बाहर से छुटकारा पाने का प्रयास चल रहा है।आखों की खिड़की से शास्त्रों को पड़ा जा रहा है मुहं के दरवाजें से भजन गाये जा रहे है,कानों द्वारा सतसंग सुने जा रहे है क्या बस इससे ही भीतर के विकार यानि दीमक मर जायेगी।चाहे दिन रात डालते यह बाहर तो भी शायद नही।हम भी खुश होते रहते है कि रोज दवाई डाल तो रहे है कभी न कभी बीमारी यानि यह विकार खत्म हो जायेगे।

कर्ज
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