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भ्रमत – भ्रमत भव चक्र में मिली मनुष्य पर्याय।

_इस अवसर चेते नहीं तो फिर पीछे पछताए।_
इसलिए फिर पीछे पछताएंगे, कहेंगे कि हमने कुछ नही किया।

_एक कथा है –_
एक राजा था। उसने अपने मन्त्री से कहा कि मन्त्रीजी हमारे पूरे शरीर में बाल है, पर हाथ की हथेली में बाल क्यों नही आते। मंत्री ने कहा – राजन्! आपके पास धन है और आप दान देते हैं, इससे दान देते – देते बाल घिस गये। तब राजा ने कहा — मैं तो दान देता हूं पर तुम्हारे भी तो बाल नही है। मैं आपका नौकर हूं, सो मैं लेता हूं इसलिए बाल घिस गये। राजा ने कहा – मैं देता हूं, तुम लेते हो। यह तो समझ में आया। पर यह जनता बैठी है इनके किसी के भी बाल नही, इनके कहां गये? मन्त्री ने कहा – राजन्! आप देते हैं, मैं लेता हूं और इस जनता के पल्ले कुछ नही पड़ता। इसलिए खाली मलते – मलते हाथ के बाल घिसा दिये। _*इसी प्रकार मानव तन भी पाया है। तो तप – त्याग व दान करो, तभी अपना जीवन सार्थक होगा। नहीं तो पछताना पड़ेगा —

_” रात गंवाई सोयकर, दिवस गंवाया खाय।_
_हीरा जन्म अमूल्य था, कोड़ी बदले जाय।।”_

इस प्रकार रात भर सोए दिन भर खाया। अपने मानव तन को यों ही विषय भोगों में खो दिया। जिस प्रकार हीरा कीमती होता है, पर अपने मुँह से नही कहता, जौहरी स्वयं उसकी कीमत लगा लेता है, उसी प्रकार हम भी गुरु चरणों में अपने जीवन को तन – मन से समर्पण कर देंगे, तभी हमारे जीवन की कीमत है। संसार में रहकर रात – दिन छल – कपट, मायाचारी करके धन इकट्ठा किया। धर्म का कार्य, आत्मध्यान नही किया तो फिर अन्त समय में रोने के अलावा हमारे पास कुछ नही रहेगा।

सबको वीर तो बनना है, पर वीर के पथ पर नहीं चलना है
November 25, 2016
श्रावक के बारह व्रत
November 25, 2016

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