नगरश्रेष्ठि और मंत्रिमंडल के सदस्य सुंदर-बहुमुल्य भेट-सौगाते लेकर आये थे। राजा को सारे उपहार अर्पित किये गये।नृत्यगनाओ के थिरकते पावों में छनकते-खनकते घुघरुओ की ध्वनि राजसभा को खुशी में डुबोती रही। सगींतकारो ने दिल खोलकर अपनी कला का प्रदर्शन किया। सभी झूमने लगे,हँसी और खुशीयो के आलम में घूमने लगे वाह वाह के शब्द सुमन होठो को चूमने लगे। महाराजा गुणसेन ने प्रसन्न चित्त से सभा को सम्बोधित करते हुए एक प्रश्न किया।महानुभाव,क्या आज नगर में किसी ने कुछ आश्चर्य की बात देखी है? विस्मित करने वाली घटना जानी है?
सभी सभासद एक दूसरे का मुंह तकने लगे। इतने में एक युवक खड़ा हुआ। उसका नाम था कल्याणक।उसने महाराजा को प्रणाम करके निवेदन किया।महाराजा, आज प्रभात में अशोकदत्त श्रेष्ठि के अशोक वन नामक उपवन में पधारे हुए एक अद्वितीय प्रतिभा के घनी मुनिश्रेष्ठ को मैने देखा है। गन्धार देश के राजा समरसेन के भतीजे लक्ष्मीसेन के वे सुपुत्र है। श्रमण जीवन अंगीकार कर के,ज्ञान-ध्यान से परिपूर्ण होकर वे आचार्यपद को प्राप्त हुए है। उनका नाम है विजयसेन।क्या तो अदभुत हैं उनका रूप लावण्य ? उनके रूप के तेज से मानो चारों दिशाएं आलोकित हो रही हैं। फिर भी उनके चेहरे पर चाँद सी सौम्यता है। जवानी के ज्वार में उफनती उम्र में होने पर भी उनके तन-नयन अविकारी है। सर्व संघ के त्यागी होने पर भी वे महापुरुष सभी जीवों पर उपकार करने के लिए सदैव तत्पर है। साक्षात धर्म मूर्ति ही है वे स्वयं। महाराजा, एक एक गांव-नगर में एक-एक महीना निवास करते हुए वे आज आपके नगर में पधारे है। विशाल मुनिवन्द उनकी चरण सेवा में तत्पर हैं। वे द्वादशांगी के आज्ञा तो है ही, तदुपरांत अवधीज्ञान और मनः- पर्यवय ज्ञान नामक दो विशिष्ट ज्ञान होने से वे त्रिकालज्ञानी है। उन्हें देखते ही अपने रोम-रोम खिल उठे वैसा उनका लावण्य है। उनसे जैसे यह धरती शोभा पा रही है।वे अपने साधु धर्म मे जागृति के साथ लीन है। मुझे तो लगता है कि सभी कुशल कर्मो का, शुभ कार्यो का फल उन्हें प्राप्त हुआ है। ऐसे विजयसेन आचार्य देव के दर्शन करने के पश्चात इस विश्व में और कुछ दर्शनीय मुझे तो लगता नही। कल्याणक, आचार्य के बारे में बताते-बताते गदगद हो उठा। उसकी आंखें हर्षाश्रु से छलक उठी। उसका रोम रोम खिल उठा। महाराजा गुणसेन भी, कल्याणक के मुंह से आचार्य के गुण सुनते हुए भावविभोर हो उठे।
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