महाराजा ने कमरे का दरवाजा खोलकर, प्रतिहारी को बुलाकर, आज्ञा की! पुरोहित सोमदेव को अभी इसी वक्त बुला लाओ। प्रतिहारी महाराजा को प्रणाम कर चला गया और शिघ्र सोमदेव को लेकर वापस आ गया। सोमदेव ने महाराजा को प्रणाम किये और महाराजा के चरणों मे ही बैठ गये। सोमदेव ने महाराजा के सामने देखा फिर कुछ पल आंखे मूंदकर मुहूर्त के बारे मे विचार किया। महाराजा वैसे तो कल का ही दिन प्रयाण के लिए श्रेष्ठ है। बहुत अच्छा, सोमदेव। तुमने तो मेरे मन की बात कह दी। कल ही प्रयाण कर देंगे परन्तु महारानी नवजात शिशु के साथ इतनी लम्बी यात्रा कर सकेगी क्या ?सोमदेव भी सोच में पड़ गये। फिर महाराजा के सामने देखकर कहा।क्या कल ही चल देना है ? मुहूर्त तो बाद में भी और देख सकते है। हाँ,निकलना तो कल ही है। यहाँ अब जैसे दम घुट रहा है एक दिन भी ठहरने को जी नही करता।
तब तो प्रयाण धीमी गति से करना होगा। महारानी कुमार के साथ बड़े रथ में प्रयास कर पायेगी। माता पुत्र शयन कर सके, उतना बड़ा एवं सुविधा सम्पन्न रथ अपने पास है। रथ में बैठने के बाद रथ बंद भी हो सकता है। केवल रथ का सारथि बाहर बैठेगा। आप यदि आज्ञा करे तो मै वह रथ तैयार करवा दु। तुम रथ को तो करवा दो। मै महारानी से बात करता हूँ। उन्हें क्षितिप्रतिष्ठित जाने का मेरा इरादा व कारण बताता हूं। यदि उन्हें कुछ दिन यहाँ रुकना जरूरी महसूस होगा तो भी कोई हर्ज नही है। बाद में वे आ सकेगें।परन्तु महारानी वसंतसेवा पीछे कैसे रुक सकती थी?उसने परिचारिका के द्वारा महाराजा को कहलवा दिया। मै भी आप के साथ ही चलूंगी। प्रयाण की घोषणा कर दी गई। राजपरिवार ने तैयारियां चालू कर दी। नगरवासी के दुःख का पार नही रहा। अगले दिन शुभ मुहूर्त में प्रयाण हो गया। वसंतपुर सुपरितोष तपोवन कुलपति आर्य कौडिन्य महातपस्वी अग्निशर्मा सब कुछ जैसे पीछे छुटता जा रहा था ।
क्षितिप्रतिष्ठित नगर को राजपुरुषों ने दुल्हन सी सजा दिया था।राजमार्ग पर सुगन्धित पानी छिड़का गया था। विविध खुशबूदार फूलो के हार एवं तोरण सजाए गये थे।सर्वतोभद्र नामक राजप्रसाद को राज्य के ख्यातिप्राप्त वास्तुविदों ने नया-निखरा रूप देकर सजाया था।विविध वाजित्रो के मंगलनाद के बीच हजारों नागरिको के साथ सपरिवार महाराजा गुणसेन ने नगर में प्रवेश किया। तुरंत ही राजसभा का आयोजन किया गया।महारानी वसंतसेना ने पुत्ररत्न को जन्म दिया है। यह बात राजपुरोहित सोमदेव ने, महाराजा के आगमन से पूर्व ही प्रकाशित कर दी थी, इसलिए भी पूरा नगर हर्ष की हिलोरों के बीच नाच रहा था।
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