खैर, तपस्वी लोग अपने शरीर के प्रति निस्पृह होते हैं और अनशन कर के मृत्यु को प्राप्त होते है, इसका मुझे रंज नही है, मुझे अफसोस है उसके संकल्प का। सोमदेव को मिले हुए तापस ने सोमदेव को उसके संकल्प की बात की थी।वह तापस भी बात करते-करते रो पड़ा था। जनम-जनम मुझे मारने की उसकी तीव्र इच्छा उसके तापस व्रत के अनुरूप नही है। एकदम विपरीत है। वैसी तीव्र पापेच्छा कर के क्या वह महातपस्वी अपने तापस जीवन को हार नहीं गया? लाखो करोड़ो मासक्षमण की दीर्घ तपश्चर्या पर उसने पानी नही फेर दिया क्या ?मेरा तो जो होना होगा सो होगा मुझे इसकी इतनी चिंता नही है राजा लोग प्रायः मर कर नरक में जाते है।ऐसा ऋषि-मुनियों का कहना है। मेरे किये हुए पापो के कारण मुझे नरक में जाना पड़ेगा, इसका मुझे खेद नही है, परंतु मेरा निमित्त पाकर यह तपस्वी उसके तप एवं व्रत को नष्ट किये जा रहा है इसकी पीड़ा मेरे भीतर को कचोट रही हैं। अब मुझे तपोवन क्यो जाना चाहिए ? नही अब मेरे वहाँ जाने से उस महात्मा का द्वेष बढ़ेगा, कुलपति की उपाधि बढ़ेगी और तपोवन में रहे हुए तापस अग्निशर्मा के प्रचंड स्वभाव से भयभीत हो उठेगे। इसलिए मेरा अब तपोवन में जाना उचित नही है। परन्तु रोजाना तपोवन के समाचार तो मुझे यहाँ पर मिलते ही रहेंगे। न सुनने लायक बातें सुनकर कभी यदि मेरे मन मे उस महात्मा के प्रति दुर्भाव पैदा हो गया तो ? मुझे इससे बचने का उपाय खोजना चाहिए।
एक ही उपाय है में, वसंतपुर छोड़कर वापस क्षितिप्रतिष्ठित नगर में लौट जाऊँ। इतने दूर यहाँ के समाचार नही मिलेंगे मुझे सुनने को। नही, अब यहाँ तो रहना ही नही है। यदि पुरोहित सोमदेव कल का मुहूर्त देते हो तो कल ही में यहाँ से प्रयाण कर दू। यह इलाका छोड़कर चला जाऊं तो ही मुझे शान्ति मिलगी। और, अग्निशर्मा जानेगा कि राजा वसंतपुर छोड़कर चला गया है। तो उसे भी संतोष होगा। इसलिए भलाई इसी में है कि जल्द से जल्द मुहुर्त में यहाँ से चल देना चाहिए। अभी सोमदेव को बुलाकर परामर्श कर लेता हूँ। राजा खड़े हुए। दरवाजे के पास गये और रुक गये।वापस झरोखे के पास आकर खड़े रहे। महारानी और नवजात राजकुमार का क्या? रानी कल कैसे प्रयाण और प्रवास कर सकेगी।आज सवेरे तो उसने पुत्र को जन्म दिया है। राजा सोचने लगे। ठीक है, सोमदेव की सलाह तो लूँ कुछ रास्ता तो जरूर निकल जएगा। परंतु अब अधिक समय यहाँ पर रहना नही है, यह तो पक्का है।
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