खन्धक मुनि विहार करते-करते अपनी बहन की राजधानी कुंतीनगर में आये |
मास के तप का मुनि के पारणा था |
राजमहल के नीचे से गुजरते मुनि को देखकर बहिन की आँख से आंसू आ गए |
राजा ने देख लिया
और
उसे रानी के चरित्र पर संदेह हो गया |
आव देखा न् ताव !
बिना विचारे जल्लाद को बुलाकर मुनि की चमड़ी उतारने का आदेश दिया |
मुनि की चमड़ी उतर रही थी,
फिर भी वे सामाधिस्थ रहकर वेदना सहन करते रहे |
केवलज्ञान हुआ
और
मोक्ष में पहुंचे |
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मुनि के छीले जाने की दुश्चर्चा नगर में हवा की भाँती फ़ैल गयी |
भेद खुला |
साले की इस भाँति निर्मम हत्या से राजा भी शोकाकुल हो उठा |
रानी के दुःख का तो ठिकाना ही नहीं था |
‘ धर्मघोष ‘ मुनि भी उसी दिन वहां पधारे |
राजा, रानी तथा सहस्रों नागरिक मन ही मन दुःख, ग्लानि, घृणा समेटे
मुनि की सेवा में उपस्थित हुए |
राजा ने अनुताप करते हुए मुनि से यही प्रश्न किया —
” भगवन ! मुझसे ही ऐसा जघन्यतम पाप क्यों हुआ ?”
उत्तर देते हुए धर्मघोष मुनि ने कहा —
” राजन ! खन्धक से पूर्व भव में एक महापाप हुआ था |
खन्धक उस समय भी राजकुमार था |
उसने उस समय एक काचर छीला था |
छिलका उतार कर वह बहुत प्रसन्न हुआ कि
बिना कहीं तोड़े मैंने पुरे काचर का छिलका एक साथ उतार दिया |
उसी प्रसन्नता से कुमार के गाढ़ कर्मों का बंधन हुआ |
उसी घोर पाप-बंध के परिणाम स्वरुप यहाँ उसकी चमड़ी उतारी गयी |
तुम भी उसी काचर में एक बीज थे |
तुमने अपना बदला यहाँ ले लिया |”
सुनने वाले कर्मों के अनुबंध पर विस्मित थे |
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वर्तमान में आम, गाजर, तरबूज आदि को इस तरह से काटकर उसकी खूब प्रशंसा की जाती है, कहीं जाने-अनजाने में मनोविनोद में ऐसे गाढे या हलके कैसे भी कर्म बंध तो नहीं हो रहे |
